शनिवार, 25 जून 2011

प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता

नयनों के डोरे लाल गुलाल-भरी खेली होली !
प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली,
एक वसन रह गई मंद हँस अधर-दशन अनबोली
कली-सी काँटे की तोली !
मधु-ऋतु-रात मधुर अधरों की पी मधुअ सुधबुध खो ली,
खुले अलक मुंद गए पलक-दल श्रम-सुख की हद हो ली-
बनी रति की छवि भोली!

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