जिंदुआ ते रस बिंदुआ...

पंजाबी में 'जुगनी' की तरह 'जिंदुआ' भी एक लोक काव्‍य रूप है। जुगनी तो हिन्‍दी फिल्‍मों में आ चुकी है। 'ओए लक्‍की लक्‍की ओए' में भी उसका एक रूप है। हालांकि इसके कई रूप मिलते हैं। जुगनी की ही तरह जिंदुआ के भी कई रूप मिलते हैं। इसमें प्रेमी और प्रेमिका का मीठा संवाद होता है, जिसमें प्रयसी अपने प्रेमी के साथ ही रहने की अभिलाषा व्‍यक्‍त करती है। इसके बारे में पूरा आलेख फिर कभी। अब हंस राज हंस की आवाज़ में यह जिंदुआ सुनिए...
मज़ा सुनकर ही आएगा, पढ़ नहीं... शब्‍दों से सुर-ताल का मेल जरूरी है।
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जिंदुआ ते रस बिंदुआ (2)
दोवें सके भरा
जिंदुए संग जिंद मेरीए लै लैण मिला (2)
होगी ला ला, सारे घर विच्‍च, सारे दर विच्‍च, घर-घर विच्‍च।
............. हो वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ (2)
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चल जिंदुआ वे चल चल्‍लीए बज़ारीं जित्‍थे ने विकदे रुमाल
हाड़ा वे जिंदुआ बुरे विछोड़े लै चल अपने नाल (2)
वे चल चंडीगढ़, चल दिल्‍ली शहर..(2).
............. हो वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ (2)
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चल जिंदुआ वे चल चल्‍लीए पहाड़ी, जित्‍थे ने विकदे अनार (2)
तूं तोड़ी मैं वेचण वाली, इक रुपइए चार
वे गोरे रंग दी मैं, लाली रंग दी मैं (2)
रब्‍ब तो रंगवाई आ ओ जिंदुआ
............. हो वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ (2)

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इक जिंदुआ वे तेरे नैण बिल्‍लौरी, विच्‍च सुरमे दी धारी
सुरमे वाले नैणा ने मेरे दिल ते बरछी मारी (2)
वे कुझ कह गया, जिंद लै गया (2)
वे जिंद मार मुकाई आ, ओ जिंदुआ
वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ हाड़ा वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ...
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चल जिंदुआ वे चल मेले चल्‍लीए चल्‍लीए शौकीनी ला
कन्‍न विच्‍च मुंदरां सिर ते शमला गल विच्‍च कैंठा पा (2)
बड़ी फबदी ए, सोहणी लगदी ए (2)
वे जेहड़ी जैकट पाई आ ओ जिंदुआ,
वे दस दस कित्‍थों सवाई आ, ओ जिंदुआ
वे दस किन्‍ने दी आई आ, ओ जिंदुआ।

जिंदुआ ते रस बिंदुआ...

यहां सुनें जिंदुआ



प्रेम का हर क्षण अनंत आशीष है...

कीट्स... प्रेम और सौंदर्य का महान गायक, जो जीता रहा 'ब्राइट स्टार' के व्रेम की बेहोशी लिए। जो जूझता रहा ताउम्र क्षयरोग की विभीषिका से। पच्चीस साल की छोटी उम्र में दुनिया को प्रेम के महानतम गीत देकर हमेशा के लिए अलविदा कह जाने वाला कीट्स अफीम का बुरी तरह आदी था। सेंट एंड्रयूज यूनिवर्सिटी के प्रोफे्रसर निकोलस रो द्वारा लिखी गई कीट्स की जीवनी इस तथ्य को उजागर करने के कारण विवादों, आलाचनाओं औरचर्चाओं में घिरी है। ये राइटअप प्रो. निमकोलस रो की पुस्तक 'जॉन कीट्स-ए न्यू लाइफ' से प्रेरित...

प्रेम का हर क्षण अनंत आशीष है
कीट्स के छोटे से जीवन में दो सुंदर नाम जुड़े। जिनमें सबसे पहले जिक्र आता है- इजाबेल जोन्स का, जो उन्हें उस समय मिली, जब वे होस्टिंग्स के पास स्थित बो पीप नामक एक गांव में छुट्टियां बिताने के लिए गए थे। इजाबेल के विषय में कीट्स ने अपने भाई जॉर्ज को लिखा था कि 'वह समाज के उच्चवर्ग की तो नहीं कही जा सकती, फिर भी वह सुंदर और बुद्धिमान है और उसे समकालीन साहित्य की काफी जानकारी है...उन्होंने 'ओ स्वीट इजाबेल' तथा 'द ईव ऑफ सेंट मार्क' जैसी कविताएं इजाबेल के लिए लिखी थीं।
कीट्स की दूसरी प्रेमिका थी- फैनी ब्राउन, फैनी से उनकी मुलाकात सितंबर तथा नवंबर, 1818 के दौरान हुई, जो बाद में परस्पर प्रेम में परिवर्तत हो गई है। पैनी कीट्स से साहित्यिक पुस्तकें पढऩे के लिए ले जाया करती थी, जैसे-जैसे यह संबंध गहरा होता गया, वैसे वैसे कीट्स अनपी पहली प्रेमिका इजाबेल से दूर होते चले गए। अब उन दोनों ने एक साथ बैठकर काव्य संग्रह पढऩा शुरू कर दिया था। यह निकटता सगाई तक भी पहुंच गई, लेकिन फिर कीट्स के तपेदिक का शिकार हो जाने के कारण सगाई शादी में परिवर्तित नहीं हो सकी। कीट्स घोर अंधेरे तथा निराशा में डूब गए। उन्होंने फैनी को लिखे एक पत्र में अपने मन की भावनाओं को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया था- 'अब मेरे जीवन में चिंतन के लिए केवल दो ही बातें रह गई हैं- एक तो तुम्हारा प्रेम, जो सदैव अमर रहेगा और दूसरी मेरी मौत।'
13 अक्तूबर, 1819 को उन्होंने लिखा- 'मेरे प्रेम ने मुझे स्वार्थी बना दिया है। फैनी, तुम्हारे बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। मैं सब कुछ भूल सकता हूं, लेकिन तुमसे बार-बार मिलना कभी नहीं भूल सकता... मुझे अपने जीवन में तुम्हारे सिवाय और कुछ नज़र नहीं आता। तुमने मुझे पूरी तरह अपने अंदर समेट लिया है... मुझे इस क्षण यह अनुभूति हो रही है मानो मैं धीरे-धीरे हवा में विलीन होता जा रहा हूं- अगर मेरी इस आशा ने दम तोड़ दिया कि शीघ्र ही मैं तुमसे मिलूंगा तो शायद मेरा जिंदा रहना भी नामुमकिन हो जाएगा। ... मुझे यह सोच कर हैरानी होती है कि कोई मनुष्य अपने धर्म के लिए शहीद हो सकता है... मेरा धर्म तो केवल प्यार है, जिसके लिए मैं अपनी जान भी न्योछावर कर सकता हूं... मैं तुम्हारे लिए मर भी सकता हूं।'

इस धरती का गीत अमर है

कीट्स एक जन्मजात कवि थे। अपने स्कूल के दिनों से ही वे तुकबंदी करने लगे थे और केवल 15 साल की उम्र में उन्होंने लैटिन के महाकवि वर्गिल के महाकाव्य वर्गिल के महाकाव्य का अनुवाद कर डाला था। उन्होंने 1814 में सुप्रसिद्ध सॉनेट 'इमिटेशन ऑफ स्पेंसर' लिखी, जबकि उनकी 'ओड टु ऑटम' 1819 में लिखी गई थी। उनके अधिकतर गीत इस पांच साल की अवधि के दौरान ही लिखे गए थे। एक बार मित्र हण्ट की चुनौती स्वीकार करते हुए कीट्स ने 15 मिनट से कम समय में ही एक सॉनेट लिख डाली थी।
रो का यह विवादास्पद कथन कि कीट्स अपनी कविताएं लिखने के लिए अफीम का सहारा लेते थे, केवल इस एक तथ्य पर आधारित है कि अक्सर अफीम से बने एक मिश्रण लौडैनम का सहारा
लेते थे। उस समय यह मिश्रण मेडिकल साइंस में एक कारगर 'पेन किलरÓ के रूप में जाना जाता था। रो का कहना है कि 'ओड टु मीलेंचली' तथा 'ओड टु मेलोडी' अफीम की तुनक में लिखी गई कविताएं है। यह कीट्स की काव्य-क्षमता पर शक करने जैसा है।
कीट्स डॉक्टरों की सलाह पर पहले इटली और फिर रोम चले गए। इटली जाने के बाद उन्होंने फैनी को कोई पत्र नहीं लिखा। शायद उन्होंने यह दर्दनाक हकीकत स्वीकार ली थी कि अब वे फैनी से कभी नहीं मिल पाएंगे। वे अपने आपको उसके दिल से बाहर निकालना चाहते थे ताकि फैनी जिंदा रह सके।
(जितेंद्र कुमार मित्तल के सौजन्य से)


Prof Nicholas Roe


कवि जहां से देखता है, दरअसल, वह वहीं रहता है

आपके टिकने की जगह या 'पोजीशन' का सवाल, लेखन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। फ़र्ज़ कीजिए, हम पांच कवियों को एक गुलाब या एक लाश देते हैं और उस पर लिखने के लिए कहते हैं। जिस 'पोजीशन' से वे उस पर लिखेंगे, वही 'पोजीशन' उन्हें एक-दूसरे से अलग करेगी। कुछ लोग इसे 'एक लेखक द्वारा अपनी आवाज़ पा लेना' कहते हैं। अपनी पोजीशन पाने में बहुत समय लगता है और मेरा मानना है कि लेखन में यही बुनियादी चुनौती भी है। एक बार आपने अपनी पोजीशन पा ली, लेखन अपने आप खुलने लगता है, हालांकि उस समय नई चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। मेरी कविताओं के मामले में बेचैनी यही थी कि इस दहलीज़ वाली पोजीशन से अरबी भाषा में कविता कैसे लिखी जाए।
आज मैं इस पूरी यात्रा का वर्णन कर पा रही हूं, लेकिन उस समय तो मैं उस बेचैनी को साधारण तौर पर निराशा ही मान लेती थी।
-ईमान मर्सल

यहां प्रस्‍तु‍त हैं ईमान की दो कविताएं

महीन रेखा

अधेड़ उम्र की एक औरत पागलों की तरह अपने प्रेमी की क़मीज़ें फाड़ती है
वह उन पर अपने आंसुओं को ख़ारिज करती है कैंचियों के ज़रिए, फिर नाख़ूनों से
फिर नाख़ूनों और दांतों के ज़रिए
मेरी कुंआरी बुआ ऐसे दृश्य पर रोया करती थी पिछली सदी में, जबकि मैं
ऊबकर उसके ख़त्म हो जाने का इंतज़ार करती थी,
मुझे रुला देते हैं अब ऐसे दृश्य.
कैंचियों, नाख़ूनों और दांतों से एक स्त्री
एक अनुपस्थित देह का पीछा करती है
उसे चबाकर, उसे निगलकर.
कुछ भी नहीं बदला है. नायिकाएं हमेशा दुख पाती हैं परदे पर,
लेकिन उत्तरी अमेरिका में आर्द्रता का स्तर हमेशा कम रहता है
सो, आंसू बहुत जल्दी सूख जाते हैं.
* * *

तुमने हवास खो दिए

मैं अपने बाल पीछे बांध लेती हूं
उस लड़की जैसा दिखने की कोशिश करती हूं
जिसे एक समय तुम बहुत लाड़ करते थे.
बरसों, घर लौटने से पहले
मैं बीयर से धोती थी अपना मुंह.
तुम्हारी मौजूदगी में मैंने कभी ख़ुदा का जि़क्र तक न किया.
ऐसा कुछ नहीं तो तुम्हारी माफ़ी के क़ाबिल हो.
तुम बहुत दयालु हो, लेकिन निश्चित ही उस समय तुमने अपने हवास खो दिए होंगे
जब तुमने मुझे यह यक़ीन दिला दिया था
कि ये दुनिया एक गर्ल्‍स स्कूल की तरह है
और टीचर की लाडली बनी रहने के लिए
मुझे अपनी इच्छाओं को एक किनारे रखना होगा.
अनुवाद: गीत चतुर्वेदी

ईमान मर्सल
30 नवंबर 1966 को जन्मी ईमान मर्सल अरबी की सर्वश्रेष्ठ युवा कवियों में से एक मानी जाती हैं। अरबी में उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और चुनी हुई कविताओं का एक संग्रह, ख़ालेद मत्तावा के अनुवाद में, 'दीज़ आर नॉट ऑरेंजेस, माय लव' शीर्षक से 2008 में शीप मेडो प्रेस से अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुआ। अरबी साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद ईमान ने बरसों काहिरा में साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिकाओं का संपादन किया। 1998 में वह अमेरिका चली गईं और फिर कनाडा। अंग्रेज़ी के अलावा फ्रेंच, जर्मन, इतालवी, हिब्रू, स्पैनिश और डच में उनकी कविताओं का अनुवाद हो चुका है। उन्होंने दुनिया-भर में साहित्यिक समारोहों में शिरकत की है और कविता-पाठ किया है। वह एडमॉन्टन, कनाडा में रहती हैं और अलबर्टा यूनिवर्सिटी में अरबी साहित्य पढ़ाती हैं।

प्रेम में कृष्‍ण, कृष्‍ण में प्रेम…



पेंटिंग : दीपाली देशपांडे
कृष्ण उस प्यार की समग्र परिभाषा है जिसमें मोह भी शामिल है, नेह भी शामिल है, स्नेह भी शामिल है और देह भी शामिल है। .कृष्ण का अर्थ है कर्षण यानी खींचना, यानी आकर्षण और मोह। सम्मोहन का मोहन भी तो कृष्ण है। वह प्रवृति से प्यार करता है। वह प्राकृत से प्यार करता है। गाय से, पहाड़ से,  मोर से, नदियों के छोर से प्यार करता है। वह भौतिक चीज़ों से प्यार नहीं करता।  वह जननी (देवकी ) को छो ड़ता है, ज़मीन छोड़ता है। ज़रूरत छोड़ता है, जागीर छोड़ता है , जिंदगी छोड़ता है, पर भावना के पटल पर अटलता देखें, वह मां यशोदा को नहीं छोड़ता। देवकी को विपत्ति में नहीं छोड़ता, सुदामा को गरीबी में नहीं छोड़ता, युद्ध में अर्जुन को नहीं छोड़ता। वह शर्तों के परे सत्य के साथ खड़ा हो जाता है टूटे रथ का पहिया उठाए आख़िरी और पहले हथियार की तरह।
उसके प्यार में मोह है, स्नेह है, संकल्प है,  साधना है,  आराधना है,  उपासना है पर वासना नहीं है। वह अपनी प्रेमिका को आराध्य मानता है इसी लिए "राध्य" (अपभ्रंश में हम राधा कहते हैं ) कहकर पुकारता है। उसके प्यार में सत्य है सत्यभामा का, उसके प्यार में संगीत है, उसके प्यार में प्रीति है। उसके प्यार में देह दहलीज पर टिकी हुई वासना नहीं है। 

पेंटिंग : दीपाली देशपांडे
( Dipali Deshpande is a self-taught Indian artist. She studied Engineering but painting is always been her passion. She worked in corporate sector for few years but her real joy was hiding in colors.)

प्रेम और प्रेम



पेंटिंग - हेस्साम अब्रिशामी

(Hessam Abrishami is an Iranian artist who lives in California, United States. Hessam’s works are greatly influenced by his dramatic life experiences and the warm acceptance he has received from the world at large.)
प्रेम किसी एक व्यक्ति से हमारे संबंधों का नाम नहीं है यह दृष्टिकोण है, एक चारित्रिक रुझान है। जो किसी व्यक्ति के साथ-साथ पूरी दुनिया से हमारे संबंधों को अभिव्यक्त करता है। वह केवल एक लक्ष्य और उसके साथ के संबंधों का नाम नहीं है। अगर एक व्यक्ति केवल दूसरे एक व्यक्ति से प्रेम करता है और अन्य सभी व्यक्तियों में उसकी रुचि नहीं है, तो उसका प्रेम, प्रेम न होकर उसके अहं का विस्तार मात्र है। फिर भी ज्यादातर लोग यही समझते हैं कि प्रेम एक 'लक्ष्य'  है न कि एक 'क्षमता'
वे समझते हैं कि भूल भी करते हैं कि यदि वे केवल अपने 'प्रेमी' या 'प्रेमिका' से ही प्रेम करते हैं, तो यह उनके प्रेम की गहराई का प्रतीक है। इसका मतलब है कि वे प्रेम को एक गतिविधि के रूप में, 'आत्मा की एक शक्ति' के रूप में नहीं देखते।
उन्हें लगता है कि एक 'प्रेमी' या 'प्रेमिका' होने का अर्थ है 'प्रेम' को पा लेना। यह बिलकुल वैसी ही बात है, जैसे कोई व्यक्ति चित्रकारी करना चाहता है और समझे कि उसे केवल एक प्रेरक विषय की जरूरत है, जिसके मिल जाने पर वह स्वत: ही बढ़िया चित्रकारी कर लेगा। अगर मैं किसी एक व्यक्ति से सचमुच प्रेम करता हूँ तो मैं सभी व्यक्तियों से प्रेम करता हूँ। किसी से 'मैं तुम्हें प्यार करने का सच्चा अर्थ' यह है कि 'मैं उसके माध्यम से पूरी दुनिया और पूरी जिंदगी से प्यार करता हूं।  |एरिक फ्रॉम|

एरकि फॉम
Erich Seligmann Fromm (March 23, 1900 – March 18, 1980) was a German social psychologist, psychoanalyst, sociologist, humanistic philosopher, and democratic socialist. He was associated with what became known as the Frankfurt School of critical theory.