शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

जिंदुआ ते रस बिंदुआ...

पंजाबी में 'जुगनी' की तरह 'जिंदुआ' भी एक लोक काव्‍य रूप है। जुगनी तो हिन्‍दी फिल्‍मों में आ चुकी है। 'ओए लक्‍की लक्‍की ओए' में भी उसका एक रूप है। हालांकि इसके कई रूप मिलते हैं। जुगनी की ही तरह जिंदुआ के भी कई रूप मिलते हैं। इसमें प्रेमी और प्रेमिका का मीठा संवाद होता है, जिसमें प्रयसी अपने प्रेमी के साथ ही रहने की अभिलाषा व्‍यक्‍त करती है। इसके बारे में पूरा आलेख फिर कभी। अब हंस राज हंस की आवाज़ में यह जिंदुआ सुनिए...
मज़ा सुनकर ही आएगा, पढ़ नहीं... शब्‍दों से सुर-ताल का मेल जरूरी है।
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जिंदुआ ते रस बिंदुआ (2)
दोवें सके भरा
जिंदुए संग जिंद मेरीए लै लैण मिला (2)
होगी ला ला, सारे घर विच्‍च, सारे दर विच्‍च, घर-घर विच्‍च।
............. हो वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ (2)
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चल जिंदुआ वे चल चल्‍लीए बज़ारीं जित्‍थे ने विकदे रुमाल
हाड़ा वे जिंदुआ बुरे विछोड़े लै चल अपने नाल (2)
वे चल चंडीगढ़, चल दिल्‍ली शहर..(2).
............. हो वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ (2)
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चल जिंदुआ वे चल चल्‍लीए पहाड़ी, जित्‍थे ने विकदे अनार (2)
तूं तोड़ी मैं वेचण वाली, इक रुपइए चार
वे गोरे रंग दी मैं, लाली रंग दी मैं (2)
रब्‍ब तो रंगवाई आ ओ जिंदुआ
............. हो वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ (2)

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इक जिंदुआ वे तेरे नैण बिल्‍लौरी, विच्‍च सुरमे दी धारी
सुरमे वाले नैणा ने मेरे दिल ते बरछी मारी (2)
वे कुझ कह गया, जिंद लै गया (2)
वे जिंद मार मुकाई आ, ओ जिंदुआ
वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ हाड़ा वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ...
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चल जिंदुआ वे चल मेले चल्‍लीए चल्‍लीए शौकीनी ला
कन्‍न विच्‍च मुंदरां सिर ते शमला गल विच्‍च कैंठा पा (2)
बड़ी फबदी ए, सोहणी लगदी ए (2)
वे जेहड़ी जैकट पाई आ ओ जिंदुआ,
वे दस दस कित्‍थों सवाई आ, ओ जिंदुआ
वे दस किन्‍ने दी आई आ, ओ जिंदुआ।

जिंदुआ ते रस बिंदुआ...

यहां सुनें जिंदुआ



बुधवार, 4 सितंबर 2013

प्रेम का हर क्षण अनंत आशीष है...

कीट्स... प्रेम और सौंदर्य का महान गायक, जो जीता रहा 'ब्राइट स्टार' के व्रेम की बेहोशी लिए। जो जूझता रहा ताउम्र क्षयरोग की विभीषिका से। पच्चीस साल की छोटी उम्र में दुनिया को प्रेम के महानतम गीत देकर हमेशा के लिए अलविदा कह जाने वाला कीट्स अफीम का बुरी तरह आदी था। सेंट एंड्रयूज यूनिवर्सिटी के प्रोफे्रसर निकोलस रो द्वारा लिखी गई कीट्स की जीवनी इस तथ्य को उजागर करने के कारण विवादों, आलाचनाओं औरचर्चाओं में घिरी है। ये राइटअप प्रो. निमकोलस रो की पुस्तक 'जॉन कीट्स-ए न्यू लाइफ' से प्रेरित...

प्रेम का हर क्षण अनंत आशीष है
कीट्स के छोटे से जीवन में दो सुंदर नाम जुड़े। जिनमें सबसे पहले जिक्र आता है- इजाबेल जोन्स का, जो उन्हें उस समय मिली, जब वे होस्टिंग्स के पास स्थित बो पीप नामक एक गांव में छुट्टियां बिताने के लिए गए थे। इजाबेल के विषय में कीट्स ने अपने भाई जॉर्ज को लिखा था कि 'वह समाज के उच्चवर्ग की तो नहीं कही जा सकती, फिर भी वह सुंदर और बुद्धिमान है और उसे समकालीन साहित्य की काफी जानकारी है...उन्होंने 'ओ स्वीट इजाबेल' तथा 'द ईव ऑफ सेंट मार्क' जैसी कविताएं इजाबेल के लिए लिखी थीं।
कीट्स की दूसरी प्रेमिका थी- फैनी ब्राउन, फैनी से उनकी मुलाकात सितंबर तथा नवंबर, 1818 के दौरान हुई, जो बाद में परस्पर प्रेम में परिवर्तत हो गई है। पैनी कीट्स से साहित्यिक पुस्तकें पढऩे के लिए ले जाया करती थी, जैसे-जैसे यह संबंध गहरा होता गया, वैसे वैसे कीट्स अनपी पहली प्रेमिका इजाबेल से दूर होते चले गए। अब उन दोनों ने एक साथ बैठकर काव्य संग्रह पढऩा शुरू कर दिया था। यह निकटता सगाई तक भी पहुंच गई, लेकिन फिर कीट्स के तपेदिक का शिकार हो जाने के कारण सगाई शादी में परिवर्तित नहीं हो सकी। कीट्स घोर अंधेरे तथा निराशा में डूब गए। उन्होंने फैनी को लिखे एक पत्र में अपने मन की भावनाओं को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया था- 'अब मेरे जीवन में चिंतन के लिए केवल दो ही बातें रह गई हैं- एक तो तुम्हारा प्रेम, जो सदैव अमर रहेगा और दूसरी मेरी मौत।'
13 अक्तूबर, 1819 को उन्होंने लिखा- 'मेरे प्रेम ने मुझे स्वार्थी बना दिया है। फैनी, तुम्हारे बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। मैं सब कुछ भूल सकता हूं, लेकिन तुमसे बार-बार मिलना कभी नहीं भूल सकता... मुझे अपने जीवन में तुम्हारे सिवाय और कुछ नज़र नहीं आता। तुमने मुझे पूरी तरह अपने अंदर समेट लिया है... मुझे इस क्षण यह अनुभूति हो रही है मानो मैं धीरे-धीरे हवा में विलीन होता जा रहा हूं- अगर मेरी इस आशा ने दम तोड़ दिया कि शीघ्र ही मैं तुमसे मिलूंगा तो शायद मेरा जिंदा रहना भी नामुमकिन हो जाएगा। ... मुझे यह सोच कर हैरानी होती है कि कोई मनुष्य अपने धर्म के लिए शहीद हो सकता है... मेरा धर्म तो केवल प्यार है, जिसके लिए मैं अपनी जान भी न्योछावर कर सकता हूं... मैं तुम्हारे लिए मर भी सकता हूं।'

इस धरती का गीत अमर है

कीट्स एक जन्मजात कवि थे। अपने स्कूल के दिनों से ही वे तुकबंदी करने लगे थे और केवल 15 साल की उम्र में उन्होंने लैटिन के महाकवि वर्गिल के महाकाव्य वर्गिल के महाकाव्य का अनुवाद कर डाला था। उन्होंने 1814 में सुप्रसिद्ध सॉनेट 'इमिटेशन ऑफ स्पेंसर' लिखी, जबकि उनकी 'ओड टु ऑटम' 1819 में लिखी गई थी। उनके अधिकतर गीत इस पांच साल की अवधि के दौरान ही लिखे गए थे। एक बार मित्र हण्ट की चुनौती स्वीकार करते हुए कीट्स ने 15 मिनट से कम समय में ही एक सॉनेट लिख डाली थी।
रो का यह विवादास्पद कथन कि कीट्स अपनी कविताएं लिखने के लिए अफीम का सहारा लेते थे, केवल इस एक तथ्य पर आधारित है कि अक्सर अफीम से बने एक मिश्रण लौडैनम का सहारा
लेते थे। उस समय यह मिश्रण मेडिकल साइंस में एक कारगर 'पेन किलरÓ के रूप में जाना जाता था। रो का कहना है कि 'ओड टु मीलेंचली' तथा 'ओड टु मेलोडी' अफीम की तुनक में लिखी गई कविताएं है। यह कीट्स की काव्य-क्षमता पर शक करने जैसा है।
कीट्स डॉक्टरों की सलाह पर पहले इटली और फिर रोम चले गए। इटली जाने के बाद उन्होंने फैनी को कोई पत्र नहीं लिखा। शायद उन्होंने यह दर्दनाक हकीकत स्वीकार ली थी कि अब वे फैनी से कभी नहीं मिल पाएंगे। वे अपने आपको उसके दिल से बाहर निकालना चाहते थे ताकि फैनी जिंदा रह सके।
(जितेंद्र कुमार मित्तल के सौजन्य से)


Prof Nicholas Roe