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शनिवार, 7 जून 2008

शाह-ओ दरवेश-ओ कलंदर...

मेरे पसंद के सूफि़यों में दूसरा नाम है सरमद। सरमद का लफ़ज़ी अर्थ 'आदि और अंत से रहित' है। जो अजर-अमर है, जो सदा जीवित है, वही सरमद है। जो समय स्‍थान से परे है, जो अनंत-असगाह है, वह सरमद है। सूफी दरवेश सरमद औरंगज़ेब के समय में हुआ। सबमें एक ही नूर को देखने वाला वह मस्‍त फ़कीर था। आधा कलमा 'लाइलाह' पढ़ता और नंगा रहता। बाहरी शरियत के उसके लिए कोई मायने नहीं थे। यही कारण था कि सत्‍य से समझौता न करने पर उसने शहादत का जाम पीना मंजूर किया। सरमद का सिर कलम कर दिया गया, सिर्फ़ इसलिए कि उसने कट्टर शरियत के बंधनों को स्‍वीकार करने से इंकार कर दिया। दोष यह लगाया गया कि वह पूरा क़लमा नहीं पढ़ता और नंगा रहता है। यह शरियत के खि़लाफ़ है। दिल्‍ली में जामा मस्जिद के सामने चबूतरे पर उसका सिर कलम किया गया। वहां अब उसका मज़ार बना हुआ है। सरमद आरमीनीया का यहूदी था। उसका जन्‍म ईरान के प्रसिद्ध तिजारती केंद्र काशान में हुआ। उसके पूर्वज किसी समय आरमीनीया के निवासी थे, लेकिन बाद में वे ईरान में आ बसे थे। कुछ इतिहासकारों ने उसका नाम मुहम्‍मद सईद माना है, जो मुस्लिम नाम है। यह भी सच है। सरमद यहूदी ख़ानदान का नौनिहाल था, जो बाद में इस्‍लाम में दाखि़ल हुआ। इस बात को वह ख़ुद भी स्‍वीकार करता है।

इस्‍लाम धारण करने और हिंदुस्‍तान आने से पहले सरमद काशान में अपना पैतृक काम व्‍यापार करता रहा। हिंदुस्‍तान में भी वह व्‍यापारिक सिलसिले में आया। यहां वह कई सथानों पर घूमता रहा। सरमद की जन्‍म तिथि के बारे में पक्‍की तरह नहीं कहा जा सकता। इतिहासकार उसका जन्‍म 1618 मानते हैं। उसका अध्‍ययन विशाल था। यहूदी परंपरा के अनुसार बचपन में सरमद को यहूदी धर्म-ग्रंथों के पाठ और व्‍याख्‍या में पारंगत कर दिया गया था। उसने सामी धर्मां के ग्रंथों का भी गहरा अध्‍ययन किया, लेकिन उसकी प्‍यास न मिटी। फिर उसने इस्‍लामी ओर पारसी धर्म ग्रंथों का भी अध्‍ययन किया। सरमद का क़लाम रुबाइयों की शक्‍ल में प्राप्‍त है। रुबाई चार पक्तियों का एक छोटा काव्‍य रूप है। फ़ारसी के सूफी शायरों ने अपनी रचना के लिए इसी रूप को अपनाया है। सरमद ने कुल 334 रुबाइयां रची हैं। फारसी में रची गई इन रुबाइयों को प्रसिद्ध विद्वान सूबा सिंह ने पंजाबी में अनुवाद किया था। यहां उसी का हिंदी रुपांतरण पेश है-

फारसी
शाह-ओ दरवेश-ओ कलंदर दीदह ई।
सरमद-ए-सरमस्‍त-ओ-रुसवा रा ब-बीं

क्‍या तुमने बादशाह, दरवेश और कलंदर को कभी देखा ?
अगर नहीं, तो आ, मदमस्‍त और बदनाम सरमद को देख लो।
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मा सरे-खुद रा चो कोह-ओ-ज़ेरे-पा दानिस्‍ता ऐम
शहर-ए-दिहली रा ब-साने-करबला दानिस्‍ता ऐम
रफ़त मनसूर अज़ कज़ा-ओ रफ़त सरमद नीज़ हम
दाहरा रा अज़ अता-ए-किबरीया दानिस्‍ता ऐम

हमने अपने सिर को पहाड़ की तरह पैरों में जाना है।
हमने दिल्‍ली शहर को करबला जाना है
कज़ा के साथ मनसूर चला गया और सरमद भी गया समझो
हमने सूलियों फ़ासियों को रब्‍बी बख्शिश समझा है
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किसी वक्‍़त न दुनिय पर चैन पाया
ना ही ऐश का कभी सामान किया
दुख-ओ दर्द ने दबोचा है उम्र सारी
और धक्‍कों ने है परेशान किया
दौलत दुनिया की दुखों की खान होती
इसने हर तरह सदा नुकसान किया
इसकी कमी बुरी, ज्‍़यादा दुख देवे
सुखी इसने न कोई इंसान किया।
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दिखाई देता जग-जहान तो है फानी
खुशिया मना, नहीं तो क्‍या मनाओगे
हो शाह या कोई फ़क़ीर हो
सबने उठ संसार से जाना है
यह छोटी-सी जिंदगी मिली तुम्‍हें
यह न गाफली में गंवा देना
सूरत यार की रखना मन में तुम
एक पल भी न उसे भुला देना।

सोमवार, 19 मई 2008

वजीदा कौण साहिब नूं आखै ...

सूफियों में वजीद मुझे बेहद पसंद हैं- अपनी बेबाकी और स्‍पष्‍टवादिता के कारण। यह सपष्‍टवादिता सर्वशक्तिमान को भी सीधा सवाल दागती है। वजीद ने किस काल में इस पृथ्‍वी पर विचरण किया, निश्‍चित रूप में कुछ नहीं कहा जा सकता। ज्‍यादातर विद्वान इस मत पर सहमत हैं कि उनका समय सोलहवीं-सतरहवीं शताब्‍दी के मध्‍य का समय था। उनकी रचना से मिलते कुछ हवालों से अनुमान लगाया जाता है कि सूफ़ी वेश धारण करने से पहले वह किसी श्रेष्‍ठ फ़ौजी पद पर कार्यरत थे। वजीद की ज्‍यादा रचना श्‍लोकों के रूप में है।

वजीद के श्‍लोक

मूरख नूं असवारी, हाथी घो‍ड़ेयां
पंडित पैर प्‍यादे, पाटे जोड़ेयां
करदे सुघड़ मजूरी, मूरख दे जाए घर
वजीदा कौण साईं नो आखे, एयों नई अंझ कर।
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गउंआं देंदा घाह, मलीदा कुत्‍तेयां
जागदेयां थीं खोह के देंदा सुत्‍तेयां
चहूं कुंटी है पाणी, तालु, सर ब सर
वजीदा कौण साहिब नो आखै, एयों नई अंझ कर
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चोर जु करदे चोरी, लिआवण लुट घर।
खांदे दुध मलाई, मलीदे कुट कर।
रहंदे तेरी आस सु, जांदे भुख ‍मरि।
वजीदा कौण साहिब नो आखै, एयों नई अंझ कर।
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इकना नूं घयो खंड, न मैदा भावई।
बहुती बहुती माया चल्‍ली आवई।
इकना नाही साग, अलूणा पेट भर।
वजीदा कौण साहिब नूं आखै, एयों नई अंझ कर।
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सूफ़ी कवि वजीद के बारे में बहुत सारे साथियों की टिप्‍पणियां प्राप्‍त हुईं। ज्‍यादातर दोस्‍तों ने वजीद के श्‍लोकों का हिंदी अनुवाद देने के लिए कहा है। में यहां इन श्‍लोकों की सरल-सी व्‍याख्‍या दे रहा हूं।
श्‍लोक 1 की व्‍याख्‍या
मूर्ख को हाथी-घोड़ों पर सवारी करने के मौके मिलते हैं। पंडित यानी समझदार लोगों को पैदल ही चलने पर मजबूर होना पड़ता है और फटे हुए कपड़ों में ही गुजर-बसर करना पड़ता है। इसी तरह सुघड़ यानी मंजे हुए या समझदार लोगों को मूर्खों के पास जाकर मजदूरी करनी पड़ती है, काम करना पड़ता है। वजीद कहते हैं कि उस साईं को, ख़ुदा को कौन कह सकता है कि वह ऐसा न करके वैसा करे।

श्‍लोक 2 की व्‍याख्‍या
गौओं को घस देता है और कुत्‍तों को मलीदा यानी चूरी खाने के लिए देता है। यही नहीं, जग रहों से छीनकर सोए हुए लोगों को दे देता है। उस साहिब को कौन कह सकता है कि वह ऐसा न करे।

श्‍लोक 3 की व्‍याख्‍या
वजीद इसमें कहते हैं कि चोर चोरियां करते हैं, लोगों को लूटते हैं, दूध मलाई और चूरियां खाते हैं यानी बुरे काम करने पर भी सबसे अच्‍छा जीवन व्‍यतीत करते हैं। लेकिन जो तुम्‍हारी यानी भगवान पर विश्‍वास रखते हैं, वे भूखे मरते हैं। वजीद कहते हैं कि ऐसा करने पर भी कौन उस साहिब को, उस परमात्‍मा को कह सकता है कि वह ऐसा न करे।

श्‍लोक 4 की व्‍याख्‍याइस श्‍लोक में वजीद कह रहे हैं, दुनिया में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्‍हें खाने के लिए घी, शक्‍कर और मैदे से बनी अच्‍छी-अच्‍छी वस्‍तुएं मिलती हैं, लेकिन वह उन पर भी नाक-भौं सिकोड़ते हैं। परंतु दूसरी तरफ़ ऐसे भी लोग हैं, जिन्‍हें पेट भरने के लिए अन्‍न का एक दाना भी नसीब नहीं होता। ऐसे में भी उस साहिब को कौन कह सकता है कि वह ऐसा न करे।

रविवार, 4 मई 2008

चार छोटी कविताएं/नव्‍यवेश नवराही

तुम हँसती
तुम हँसती-
फूल खिलते
उड़ान भरते हैं पंछी
सुगंधित हो जाती हवा
जब तुम हँसती

खिड़की
आप जिस खिड़की से देख रहे हैं
ज़रूरी नहीं
वो सही ही हो।
देख जाने वाले
उस दृश्य के कई पक्ष
हो गए होंगे औझल
आपकी आँख से।

प्रिय तुम...
प्रिय तुम उदास मत होना
कैसी भी हों राहें, मुश्किलें
अपनी यह निर्दोष मुस्कान
मत खोना
पतझड़ भी तो एक पड़ाव है
किसी अंजान
मंजिल की ओर बढ़ती
हसीन बहार का...
लेकिन तुम धैर्य मत खोना
प्रिय, तुम उदास मत होना।

'हैलो' मंत्र
मन में
जब भी गुस्से की बिजली कौंधती
खून में फैलता नफ़रत का ज़हर
फ़ोन पर
तुम्हारा एक ही शब्द-
'हैलो...'
मंत्र फूँकता
सब हलचलों को शांत कर देता