शुक्रवार, ८ मई २००९

धुआं बना कर फिजा में उड़ा दिया हमको

मीर नज़ीर बा$करी जाने-माने शायर हैं। इनकी शायरी को आपने जगजीत सिंह की आवाज़ भी सुना होगा। जगजीत जी की आवाज़ में गाई हुई उनकी $गज़लें रूह की गहराइयों को छूने वाली हैं। कुछ समय पहले वह जालंधर में आए थे। यहां पर हमारी साथी रूहे सना हसन ने उनके साथ गुफ्तगू की। उस गुफ्तगू के साथ-साथ आप उनकी दो रचनाओं को भी गुनगुनाइए...
----
गज़लें /मीर नज़ीर बाकरी
है सब नसीब की बातें खता किसी की नहीं
ये जि़ंदगी है बड़ी बेव$फा किसी की नहीं।

तमाम ज$ख्म जो अंदर तो चीखते हैं मगर
हमारे जिस्म से बाहर सदा किसी की नहीं।

वो होंठ सी के मेरे पूछता है चुप क्यों हो
किताबे-ज़ुर्म में ऐसी सज़ा किसी की नहीं।

बड़े-बड़े को उड़ा ले गई है त$ख्त केसाथ
चरा$ग सबके बुझेंगे हवा किसी की नहीं।

'नज़ीरÓ सबकी दुआएं मिली बहुत लेकिन
हमारी मां की दुआ-सी दुआ किसी की नहीं।

---------------------

समझकर फूल सी टूटू हुई कुछ पत्तियां उसने
मसल कर फैंक दीं हैं, जाने कितनी तितलियां उसने।

पहनकर अपने हाथों में सुनहरी चूडिय़ां उसने
बढ़ा दी है किसी मज़दूर की बेचेनियां उसने।

किसी इंसान ने उसकी ज़रूरत जबन की पूरी
दरिंदों के हाथें ही बेच दी फिर लड़कियां उसने।

वो एक पंछी जिसे सय्याद ने $कैदी बनाया था
सुना है तोड़ दी सारी कऊस की तीलियां उसने।

हवा ऐसी चली थी सारे घर में $खा$क भर देती
$गनीमत है कि पहले बंद कर ली खिड़कियां उसने।

जलन दिल की बुझाने को भिगोकर अपने अश्$कों से
मेरे सूखे हुए होंठों पे रख दी उंगलियां उसने।

'नज़रÓ अब तो सकून-ए-जि़ंदगी की जुस्तजू छोड़ो
तुम्हारे नाम लिख दी है सभी बेचेनियां उसने।
----

गुफ्तगू
वह बेनजीर शायर हैं, क्योंकि उनका नाम है मीर न•ाीर बा$करी। मेरी मुराद उस बेबाक और हौसलेमंद शायर से है, जिसकी शायरी में $ख्यालात का बांकपन तो है, पर ल$फ्जों की बा•ाीगिरी नहीं। वह जो कुछ कहता है, $खूब कहता है। यह वही शायर हैं, जिनकी $ग•ालों को जगजीत सिंह ने अपनी रुहानी आवा•ा देकर एक हंगामा बरपा कर दिया था। सुरों की मल्लिका लता जी ने अपनी आवा•ा में 'धुंआ बना कर फि•ाा में उड़ा दिया मुझकोÓ गाकर उन्हें धुआं बनाकर उड़ाया नहीं, बल्कि सूरज की रोशनी बनाकर हमेशा के लिए अमर कर दिया। आज वही अ•ाीम शायर मेरे रू-ब-रू है। आइए उनसे पूछते हैं कुछ सवाल उनकी •िांदगी और शायरी के स$फर के बारे में-
शायरी कब से शुरू की?
मेरे अंदर शायर कब से सांसे ले रहा था, इसका तो मुझे अंदा•ाा नहीं, मगर हां जब पता चला, तो वह साल 1962 का था। इसी साल मैंने अपना पहला शेर कहा, जो मैं आपको भी सुनाना चाहूंगा-
बाद मुद्दत के बाद सोया हूं $गमों से कह दो
अब कभी आन के मुझको परेशां करना।

दुनिया के ग्लोबल विलेज बनने के बाद एक शायर सि$र्फ मु$कामी शायर नहीं रह जाता। उसका वास्ता बाहर के मुल्कों के शायरों से भी पड़ता है। ऐसे में आपको हिन्दुस्तान और यहां से बाहर की उर्दू शायरी में क्या $$र्क महसूस होता है?
शायरी के शौ$क की वजह से मुझे इंग्लैंड, अमरीका, दुबई, शारजा, अबु धाबी, मस्कट, कूवैत और दोहा-कतर के अलावा बंग्लादेश और पाकिस्तान जाने का मौ$का मिला। इन मुल्कों में घूमने के बाद मुझे अहसास हुआ कि हिन्दुस्तान में अच्छे शायरों की कमी नहीं है, लेकिन जिन शायरों को मीडिया कवरेज मिल रही है, उनमें वह म्यार नहीं है, जो होना चहिए। पहले शायरी मैसेज देने का •ारिया होती थी, लेकिन अब लोगों ने इसे मनोरंजन का •ारिया बना लिया है। यह माहौल बाहर अभी कम है। वहां लोग मुशायरों में य$कीनी तौर पर अपनी रुहानी गी•ाा, •ाुबान और कल्चर समझ कर शरी$क होते हैं। वहां मुशायरों में आने वाले लोग पढ़े-लिखे होते हैं और हर मुद्दे पर अपनी राय रखते हैं। इसलिए म्यारी शेरों पर म्यारी दाद दी जाती है।

आज हिन्दुस्तान की उर्दू शायरी को किस ार से देखते हैं?
अब शायरी पर प्रोफैश्नलि•म हावी हो रहा है। शायरी ने अपना म्यार $खत्म कर दिया है क्योंकि उसके सामने सुनने वालों के म्यार की मजबूरी थी। उन्हें न हिंदी आती है और न उर्दू। हल्के शेरों पर भी शायर को दाद मिल जाती है। ऐसे मेंाुबान की तबली$ कौन करे?
हिन्दुस्तान में उर्दू का क्या मुस्त$कबिल देखते हैं?
•ाुबान किसी म•ाहब से नहीं पहचानी जाती, लेकिन उर्दू के साथ यह बद$िकस्मती रही कि उसे मुसलमानों के पल्ले बांध दिया गया और मुसलमानों ने उसे अपनाया नहीं। हालत तो यह है कि उर्दू के ठेकेदारों ने भी इससे कुछ इस तरह से मोहब्बत निभाई कि उनकी ओलादें उर्दू से नावाकि$फ हैं।
छोड़कर अपनीाुबा सबकी जबानें सीख लीं,
इसी $खता ने हमको अपने घर में गूंगा कर दिया
वैसे पंजाब के लिए उर्दू के दामन को बचाए रखना इतना मुश्किल नहीं है। इसका कारण यह है कि इस •ाुबान के दामन को जीतना इसने भरा है, उसका मु$काबला कोई दूसरा सूबा नहीं कर सकता।

आज देश के राजनीतिक महौल में एक शायर $खुद को कहां पाता है?
इस व$क्त की सबसे बड़ी बदनसीब है कि हमारे पास कोई प्योर पॉलीटिकल शायर नहीं है। आज शायर अपने इर्द-गिर्द का •िाक्र तो करता है, लेकिन उस पर टिप्पणी करने वाला कोई नहीं है। शायद शायर $खुद को अकेला समझ रहा है या हो सकता है वह अपनी सच्चाई का $कत्ल न करना चाहता हो। मुझे भी आप पॉलीटिकल शायर नहीं कह सकते, लेकिन मैंने भी कुछ पॉलीटिकल शेर लिखे हैं-
तुम अपनी रोशनियों पर $गुरूर मत करना
चरा सबके बुझेंगे हवा किसी की नहीं।
अपनीिांदगी के बारे नें कुछ बताइए।
मैं देश के बड़े सूबों में से एक उत्तर प्रदेश में पीतल नगरी कहे जाने वाले मुरादाबाद से हूं। यहां कभी पृथ्वी राज चौहान की राजधानी रहे तहसील संभल से चौदह किलोमिटर दूर एक गांव है, नेमतपुर, मेरा रिश्ता वहीं से है। मैंने लखनऊ से अपनी पढ़ाई पूरी की, जिस वजह से इसे मैं अपना तालीमी वतन कहता हूं। एक शायर $खुबसूरती में दिलचसपी न ले, ऐसा तो हो नहीं सकता। मैंने भी इस $खुबसूरती को घरों में जगह दी और मुंबई आकर इंटीरियर डैकोरेशन की कंपनी में मैनेजर रहा। मैंने रेडियो सैलून, श्रीलंका के लिए भी कमर्शियल किए।

आपकी $ालों को लोगों ने का$फी पसंद किया है। कई मशहूर लोगों नें भी इन्हें अपनी आवा दी है। इस बारे में हमें कुछ बताइए।
मेरी लिखी $ग•ालों को जगजीत सिंह, लता मंगेशकर, अजी•ा ना•ाा, राज कुमार रि•वी, इंद्रानी रि•वी, गौरव चोपड़ा और शीला वर्मा ने अपनी म$खमली आवा•ाों से सजाया है। जगजीत सिंह की आवा•ा में 'अपनी आंखों के समंदर में उतर जाने दे और 'याद नहीं क्या -क्या देखा था, सारे मं•ार भूल गएÓ और लता जी की आवा•ा में 'धुंआ बना कर फि•ाा में उड़ा दिया मुझकोÓ को लोगों ने काफी पसंद किया है।

पंजाब से आपका ताल्लु कैसा रहा?
पंजाब से मुझे मोहब्बत है। इसी •ामीं ने मुझे अपनी पहचान बनाने में मदद की। 70 के दशक में जब मैंने लिखना शुरू ही किया था, तो यहां से निकलने वाले दो बड़े और मशहूर अ$खबारों ने मुझे का$फी छापा।

दूसरे उभरते शायरों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
शायरी की बुनियाद फिक्र और ओब्सर्वेशन होती है। ओब्सर्वेशन के लिए आपके पास सोच और पढ़ाई होनी चाहिए। इसलिए जितना •यादा किसी दूसरे शायर को पढ़ सकें, उतना ही अच्छा है। कहते भी है कि चरा$ग से चरा$ग जलता है। कहीं ऐसा न हो कि कोई चरा$ग जल ही न सके।

मंगलवार, ३१ मार्च २००९

कवि‍यित्री से बातें

युवा पंजाबी कवियित्री इंद्रजीत नंदन की पुस्तक 'शहीद भगत सिंह : अनथक जीवन गाथाÓ को साल 2008 के प्रतिष्ठित 'संस्कृति पुरस्कारÓ मिला है। राष्ट्रीय स्तर पर दिया जाने वाला यह पुरस्कार 'संस्कृति प्रतिष्ठान, नई दिल्लीÓ द्वारा अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय युवा प्रतिभाओं को दिया जाता है। पूरे 29 साल बाद यह पुरस्कार पंजाबी को मिला है। पेश है कवियित्री इंद्रजीत नंदन से एक मुलकात...

भगत सिंह के जीवन पर लंबी कविता लिखने की प्रेरणा कहां से मिली?
मैंने २००२ में भगत सिंह पर एक कविता लिखी थी 'फांसी से पहले।Ó यह कविता मेरी पुस्तक 'चुप दे रंगÓ में शामिल है। इसे लिखते हुए मेरे मन में आया कि शायद मैं भगत सिंह पर नंबी कविता लिख सकती हूं। वह कविता सि$र्फ एक मौ$के के बारे में थी, जब भगत सिंह की अंतिम मुला$कात अपने घर वालों से होती है और $फासी के त$ख्ते तक जाने का इसमें चित्रण था। तभी मुझे महसूस हुआ कि भगत सिंह को समझना/समझाना छोटी कविता के बस की बात नहीं। उसके बाद मैंने भगत सिंह की सोच को समझने के लिए अध्ययन शुरू किया। इसी दौरान २००४ में एक लंबी कविता 'तेरी काया मेरे शब्दÓ लिखी गई। इसके बाद मुझे लगा कि शायद मैं लिख सकती हूं और मैंने इस पर काम शुरू कर दिया। इस पुस्तक को फाइनल करने तक मैंने इसे चार लिखा और तीन साल तक इस पर काम करती रही।

भगत सिंह को ही क्यों चुना?
भगत सिंह पर पंजाबी कविता में उतना काम नहीं हुआ, जितनी बड़ी उस महान शहीद की कुर्बानी और सोच थी। सि$र्फ प्रो दीदार सिंह के $िकस्से के अलावा किसी ने ज़्यादा काम नहीं किया। अगर हुआ भी है, तो वह काल्पनिक या आज के संदर्भ में भगत सिंह के पात्र को चित्रित करके ही हुआ है। दूसरी बात यह भी हो सकता है, मैंने अपनी उम्र की पहली कविता भी भगत सिंह के बारे में लिखी थी और यह बचपन से ही मेरे अवचेतन में कहीं पड़ा हो।

आपने इसे परंपरागत छंद में लिखा है। कोई मुश्किल नहीं आई?
थोड़ी मुश्किल तो आई, क्योंकि ऐतिहासिक तथ्यों को कविता में पिरोना ज़रा मुश्किल होता है। दूसरा, इसे लिखने से पहले मैंने छंदों को सीखा।

इस लंबी कविता के ज़रिए आपने सि$र्फ भगत सिंह की जीवनी ही पेश किया है, जबकि इस संबंध में कई पुस्तकें उपलब्ध हैं। फिर इस पुस्तक की क्या प्रासंगिकता आप देखती हैं?
उपलब्ध पुस्तकों के बारे में यह है कि वे पुस्तकें कविता में उपलब्ध नहीं हैं। जो हैं, वह भगत सिंह की पूरी जि़ंदगी या विचारधारा को पेश नहीं करतीं। मैंने इस पुस्तक में भगत सिंह के पारिवारिक परिदृश्य को बहुत पीछे से समझने और जानने की कोशिश की है। इस परिवेश का भगत सिंह के जीवन पर कितना और कैसा प्रभाव रहा, इसे भी मैंने समझने का प्रयास किया है। बा$की मैं अपने आप को कवियत्री मानती हूं, इसलिए स्वाभाविक है कि कविता ही रचूंगी।

आपकी कविताएं कथित नारीवाद से हटकर औरत की सामाजिक स्थिति और भूमिका के बारे में अलग कोण से बात करती हैं। इसके बारे में कुछ कहना चाहेंगी?
दरअसल, न ही नारीवार से और न ही किसी और वाद से मेरा कोई संबंध है। मैं वादों से मुक्त होकर जीने, विचरण करने और लिखने की आदी हूं। कोई भी वाद मुझे अच्छा नहीं लगता। इसलिए समाज में रहते हुए, जो मैं आंतरिक और बाहरी तौर पर महसूस करती हूं, वही लिखती हूं। मैं इंसान होने पर और इंसानियत में ही भरोसा करती हूं। बा$की ज़रूरी नहीं कि सि$र्फ नारी होने के कारण सभी औरतों का अनुभव एक जैसा ही हो।

कविता और समाज के रिश्ते को कैसे देखती हैं?
कविता समाज से टूटकर नहीं लिखी जा सकती। भले ही आप अंतरमुखी हों या बाहरमुखी, समाज से दूर नहीं हो सकते। मेरे $ख्याल में कवि ज़्यादा संवेदनशील होता है और वह हर घटना को ज़्यादा गहराई से महसूस करता है। जो उसके ज़हन में है, वह कविता में आना स्वभाविक है। भले ही उसमें कल्पना भी शामिल हो, लेकिन पैदा तो विचार से ही हुई है। विचार-प्रक्रिया भी हमारी स्मृतियों का ही हिस्सा है। कवि जो देखेगा, जो बिंब बनेंगे, कविता में आएंगे ही। कवि समाज से बेमुख नहीं हो सकता। कवि और कविता दोनों ही समाज के प्रति जि़म्मेदार हैं।

कविता आपके लिए क्या है?
कविता मेरे लिए जीने का रास्ता है। मैं कविता के बिना अधूरी हूं। इसके बिना मैं जी नहीं सकती या कह लें, कविता ही मेरी जि़ंदगी है।
- नव्यवेश नवराही
(दैनिक भास्‍कर, पंजाब के कला साहित्‍य अंक से साभार)

शनिवार, २१ मार्च २००९

सुखवंत के शब्‍द रंग

सुखवंत पंजाब के चित्रकार कवि हैं। कागज़ पर शब्‍दों के रंग उकेरते हैं। ज्‍यादा छपने में उनका विश्‍वास नहीं। लिखते हैं और अपनी डायरी में नोट करके संतुष्‍ट रहते हैं। पंजाबी की कई पत्र्िकाओं में उनकी पंजाबी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं. अपनी पंजाबी ग़ज़लों की पुस्‍तक की तैयारी में भी लगे हुए हैं. कुछ दिन पहले उनकी डायरी से मुझे हिंदी की कुछ ग़ज़लें मिलीं, तो मैंने उन्‍हें आपके लिए चुरा लिया. उनकी रचनाओं के बारे में उन्‍हीं के शब्‍दों में कहूं तो

जल रंगों से आग बनाया करता हूं
ओर फिर उसमें जलने से भी डरता हू

आप भी उनके अनुभवों से गुज़रें
-----------------------
गज़लें/सुखवंत
जम चुकी बर्फ से पानी को उछालूं कैसे।
अपने चेहरे को मैं दर्पण से निकालूं कैसे।

हवा तो रोज़, कभी आंधियां भी चलती हैं,
बदन है रेत की दीवार संभालूं कैसे।

मेरे रंगों में तेरे नक्श उतर सकते हैं,
तेरी आवाज़ को तस्वीर में ढालूं कैसे।

शहर के बारे में अब सोच के चुप रहता हूं,
आग जंगल की है, सीने में लगा लूं कैसे।

मैं तो अब तक यूं ही बेमोल बिका हूं और अब,
अपने कंधों पे यह बाज़ार उठा लूं कैसे।
------

2
होश में हूं पर कुछ कुछ आंखें मीचे हूं।
मस्ती में हंू ना आगे ना पीछे हूं।

मेरा हर इल्ज़ाम मेरे सिर है फिर भी,
जो कुछ हंू मैं कब अपनी मजऱ्ी से हूं।

तेरी ही तस्वीर उभरती है अक्सर,
का$गज़ पे इक खाका जब भी खींचे हूं।

इनमें तब तक फूल व$फा के खिलते हैं,
आंसू से मैं जब-जब आंखें सीचे हूं।

पेड़ तो शायद इस धरती का आंचल हैं,
धूप कड़ी है मैं आंचल के नीचे हूं।

------
3
रोशनी के लिए दीवार में झरोखा है।
यह बात और है इसमें भी कोई धोखा है।

इस चकाचौंध से उभरें तो ज़रा $गौर करें,
इन उजालों ने कहां चांदनी को रोका है।

शो$ख रंगों के तिलिस्म को अंधेरा ना लिखूं,
आज फिर सर्द हवाओं ने मुझे टोका है।

ह$की$कतों की धूप से बचाकर रखता है,
मन की परछाइयों का दर्द भी अनोखा है।

मैंने दीवार गिराई है चलो मान लिया,
मेरे माथे पे मगर कील किसने ठोका है।
-----
4
मन के मौसम को बदल दें सुबह को शाम करें।
अपने साए में कहीं बैठ कर आराम करें।

गुनगुनी धूप के मासूम से उजाले को,
नज़र में ऊंघती अंधी गु$फा के नाम करें।

चलो धरती को फिर से झाड़कर बिछाते हैं,
बेकार फिरने से अच्छा है कोई काम करें।

अब उनके वासते आबो-हवा ही का$फी है,
क्या ज़रूरी है कि नस्लों का $कत्ले-आम करें।

अगर वो सिर है तो छोड़ो वो बिक ही जाएगा,
अगर हैं पैर तो बेड़ी का इंतज़ाम करें।

यह मानते हैं कि रूहें सदा सलामत हैं,
वो इनमें रहती हैं, जिस्मों को भी सलाम करें।

आज की रात चलो म$खमली अंधेरों में,
घरों को छोड़कर सड़कों को बेआराम करें।

--------
5

रास्तों में या अपने घर होगा।
इन अंधेरों में वो किधर होगा।

इस समागम के बाद लगता है,
आग में जल रहा शहर होगा।

चंद लोगों की साजिशों का असर,
क्या $खबर थी कि इस $कदर होगा।

मैं किसी बात से ना डर जाऊं,
उसको इस बात का भी डर होगा।

हादसा फिर भी हादसा है जनाब,
लाख बचिएगा वो मगर होगा।
----
संपर्क
मोबाइल- 098720 25360
sukhwantartist@gmail.com

----

गुरुवार, ८ जनवरी २००९

मोहब्‍बत भरी दो नज्‍में

पंजाबी के वरिष्ठ कवि डॉ. जगतार जितना भारतीय पंजाब में प्रसिद्ध हैं, उससे कहीं ज़्यादा उन्हें पाकिस्तानी पंजाब में मान्यता दी जाती है। साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार प्राप्‍त डॉ. जगतार नज्‍म व ग़ज़ल लिखते हैं. उनकी प्रमुख पुस्‍तकों के नाम हैं- प्रवेश द्वार, चनुक्‍करी शाम, जजीरियां विच्‍च घिरिया समुंदर, अधूरा आदमी, लहू के नक्‍श,‍ दुध पत्‍थरी और तलखियां रंगीनियां. ये सभी पुस्‍तकें चेतना प्रकाशन, पंजाबी भवन, लुधियाना, पंजाब द्वारा प्रकाशित पंजाबी पुस्‍तक अणमुक सफर में शामिल हैं. पेश हैं उनकी दो नज्‍में
---

रिश्तों के पिंजरे
वह मेरे जिस्म के इस पार झांकी
उस पार झांकी
और कहने लगी,
'तुम मेरे बाप जैसे भी नहीं
जो दारू की नदी तैर कर
डुबो देता है उदासी में घर सारा।
तुम मेरे पति जैसे भी नहीं
जो मेरी रूह तक पहुंचने से पहले ही
बदन में तैर कर
नींद में डूब जाता है।
तुम मेरे भाई जैसे भी नहीं
जो चाहता है
कि मैं बेरंग जीवन ही गुज़ारूं
मगर फिर भी
तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो।
मगर क्या नाम रखूं इस रिश्ते का
मैंने जो रिश्ते जिए, पिंजरे हैं
या कब्रें हैं
या खंडहर हैं।

हैंडल विद केयर
मेरे यहां आने से पहले
वह कॉलेज में थी।
अब भी उसके जिस्म और माज़ी की खुशबू
इस तरह लगता है जैसे
हर जगह मौजूद है।
जो कभी फूलों से, कमरे से
कभी माहौल से आती रहती है।
इस तरह लगता है कभी कैंटीन में
कॉफी की उठ रही भांप में
उसका चेहरा बन रहा है
और कभी लगता है पीरियड समाप्त करके
आ रही है वह उदासी।
और कभी लगता है कि बारिश में
खंबे के साथ लगी
वह किसी का इंतज़ार कर रही है
(किसका?)
मेरी जिंदगी में वह जब हुई दाखिल
मैंने कभी पूछा ही नहीं था।
न ही मेरा है स्वभाव
क्योंकि इस तरह के सवालों से
औरत तिड़क जाती है हमेशा।
पंजाबी से अनुवाद- नव्‍यवेश नवराही

सोमवार, २४ नवम्बर २००८

कुंवर नारायण को बधाई

वर्ष 2005 का ज्ञानपीठ पुरस्‍कार शीर्षस्‍थ कवि कुंवर नारायण को दिए जाने की घोषणा हुई है. इस मौके पर प्रस्‍तुत हैं उनकी कुछ रचनाएं
पुनश्‍च
मैं इस्‍तीफा देता हूं
व्‍यापार से
परिवार से
सरकार से
मैं अस्‍वीकार करता हूं
रिआयती दरों पर
आसान किश्‍तों में
अपना भुगतान
मैं सीखना चाहता हूं
फिर से जीना...
बच्‍चों की तरह बढ़ना
घुटनों के बल चलना
अपने पैरों पर खड़े होना
और अंतिम बार
लड़खड़ा कर गिरने से पहले
मैं कामयाब होना चाहता हूं
फिर एक बार
जीने में
.......

तबादले और तबदीलियां
तबदीली का मतलब तबदीली होता है, मेरे दोस्‍त
सिर्फ तबादले नहीं
वैसे, मुझे ख़ुशी है
कि अबकी तबादले में तुम
एक बहुत बड़े अफसर में तबदील हो गए
बाकी सब जिसे तबदील होना चाहिए था
पुरानी दरखास्‍तें लिए
वही का वही
वहीं का वहीं
'कोई दूसरा नहीं' (राजकमल प्रकाशन) से साभार
............
वे इसी पृथ्वी पर हैं
कुंवर नारायण
कहीं न कहीं कुछ न कुछ लोग हैं जरूर
जो इस पृथ्वी को अपनी पीठ पर
कच्छपों की तरह धारण किए हुए हैं
बचाए हुए हैं उसे
अपने ही नरक में डूबने से
वे लोग हैं और बेहद नामालूम घरों में रहते हैं
इतने नामालूम कि कोई उनका पता
ठीक-ठीक बता नहीं सकता
उनके अपने नाम हैं लेकिन वे
इतने साधारण और इतने आमफ़हम हैं
कि किसी को उनके नाम
सही-सही याद नहीं रहते
उनके अपने चेहरे हैं लेकिन वे
एक-दूसरे में इतने घुले-मिले रहते हैं
कि कोई उन्हें देखते ही पहचान नहीं पाता
वे हैं, और इसी पृथ्वी पर हैं
और यह पृथ्वी उन्हीं की पीठ पर टिकी हुई है
और सबसे मजेदार बात तो यह है कि उन्हें
रत्ती भर यह अन्देशा नहीं
कि उन्हीं की पीठ पर टिकी हुई है यह पृथ्वी ।
.......
अजीब वक्त है -
बिना लड़े ही एक देश- का देश
स्वीकार करता चला जाता
अपनी ही तुच्छताओं के अधीनता !

कुछ तो फर्क बचता
धर्मयुद्ध और कीट युद्ध में -
कोई तो हार जीत के नियमों में
स्वाभिमान के अर्थ को फिर से ईजाद करता ।
( साभार : सामयिक वार्ता / अगस्त-सितंबर, १९९३ )

रविवार, २३ नवम्बर २००८

गर मुहब्बत ज़माने में है इक खता

श्रद़धा जैन की ग़ज़लें ही उनका परिचय है.
नव्‍यवेश


ग़ज़लें
आप भी अब मिरे गम बढ़ा दीजिए
मुझको लंबी उमर की दुआ दीजिए

मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए

रोशनी के लिए, इन अंधेरों में अब
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए

चाप कदमों की अपनी मैं पहचान लूं
आईने से यूँ मुझको मिला दीजिए

गर मुहब्बत ज़माने में है इक खता
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए

चाँद मेरे दुखों को न समझे कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए

हंसते हंसते जो इक पल में गुमसुम हुई
राज़ "श्रद्धा" नमी का बता दीजिए
---

जब मिटा के शहर गया होगा
एक लम्हा ठहर गया होगा

है, वो हैवान ये माना लेकिन
उसकी जानिब भी डर गया होगा

तेरे कुचे से खाली हाथ लिए
वो मुसाफिर किधर गया होगा

ज़रा सी छाँव को वो जलता बदन
शाम होते ही घर गया होगा

नयी कलियाँ जो खिल रही फिर से
ज़ख़्म ए दिल कोई भर गया होगा

मंगलवार, १८ नवम्बर २००८

हाथ कंगन को आरसी क्‍या

हिंदी भाषा में एक भरा पूरा ब्‍लॉग जगत है. हर दिन धडाधड नए ब्‍लॉब बन भी रहे हैं. किसी भी भाषा के विकास के लिए इस तरह के काम बेहद ज़रूरी होते हैं. लेकिन क्षेत्रीय भाषाओं में अभी इस तरह का रुझान पैदा नहीं हुआ. हालांकि नैट पर इन भाषाओं में ब्‍लॉग बनाने की सुविधा है. पंजाबी के बारे में भी ऐसा ही कहा जा सकता है. भले ही पंजाबी लोग पूरे विश्‍व में फैले हुए हैं, लेकिन पढ़ने लिखने की बात आए, तो़़़़खैर, पिछले दिनों कनाडा से मित्र तनदीप तमन्‍ना ने पंजाबी भाषा में 'आरसी' नाम से ब्‍लॉग शुरू किया है. खुशी हुई कि पंजाबी में इस तरह के रुझान की शुरुआत हुई है. तनदीप स्‍वयं पंजाबी की एक अच्‍छी कवियित्री हैं. जिन लोगों को गुरमुखी स्क्रिप्‍ट पढ़नी आती हो, वह एक बार ज़रूर इस पर विजिट करें.

सोमवार, २२ सितम्बर २००८

रात के तीसरे पहर एक स्त्री जूड़ा बांधती है

इस बार मिलिए रवींद्र व्‍यास से. हिंदी के युवा कहानीकार और चित्रकार रवींद्र की कविताओं की तरलता अलग-से ध्यान खींचती है। इंदौर में रहते हैं। इन दिनों ब्लॉगजगत में इनकी उपस्थिति की भी बड़ी चर्चा है।

रात के तीसरे पहर एक स्त्री जूड़ा बांधती है / रवींद्र व्‍यास

बिल्ली उसके अधूरे स्वप्न पर
दूध ढोल जाती है
चूहे उसकी नींद को कुतरने लगते हैं
मटके में भरा ताजा पानी रिसते रहता है
उनके तकिये पर छिपकली गिरती है
रात के तीसरे पहर में
एक स्त्री की नींद टूटती है
और वह हड़बड़ाकर बैठ जाती है
जिस दिवाल से वह
पीठ टिकाकर बैठती है
उस पर मकड़ी अपना जाला बुनती रहती है
रात के तीसरे पहर
वह स्त्री अपने खुले बालों को झटकती है
और जूड़ा बांध लेती है


गर्दन के नीचे हबा हाथ
यह इश्तहार ही हो सकता है
जो स्त्री का दु:ख
उसके सफेद होते बालों में देखता है
वह स्त्री अपनी शादी की तस्वीर के पीछे से
मकड़ी को सरकता देख सिहर जाती है
जिस आईने में देख वह बिंदी लगाती है
उसके पीछे से एक छिपकली निकलती है
और मकड़ी को चट कर जाती है
वह चौंकती नहीं
बस, अपने पास सोए आदमी को देखती है
जिसका हाथ उसकी छाती पर
जन्म-जन्मांतरों से पड़ा हुआ है
असंख्य तारे झिलमिलाते रहते हैं
और चंद्रमा सरकता रहता है
सुबह वह स्त्री
अपना दाहिना हाथ झटकती है
जो पति की गर्दन के नीचे दबा रह गया था

रविवार, १४ सितम्बर २००८

पूरन का कुआं

पूरन भक्त की कुर्बानी और सामंती दौर में अपनी परंपराओं से जुड़े रहने के बदले में मिली मौत से भी बदत्तर सजा की कहानी पंजाब के बच्चे-बच्चे की जबान पर है। पूरब ही नहीं पश्चिमी पंजाब का भी हर बाशिंदा इस कहानी को अपने मन में बसाए हुए है...

उस दिन राजे सलवान के घर पूरन ने जन्म लिया, उसी दिन लद्धी के घर में दुल्ला पैदा हुआ था। यह अकबर के राज्यकाल का समय था।Ó फरूखाबाद के रहने वाले और वारिस शाह फाउंडेशन के प्रधान मोहम्मद वारसी बहुत उत्साह से बता रहे थे। हमारे पास लाहौर हाईकोर्ट के जज जनाब अकरम बिट्टु, जो साईं मीयां मीर दरबार लाहौर के चेयरमैन भी हैं, की गाड़ी की और हम लाहौर से सियालकोट के शाहराह पर जा रहे थे। मेरे साथ अमृतसर के हरभजन सिंह बराड़ और साईं मीयां मीर इंटरनैशनल फाउंडेशन की लुधियाना इकाई के प्रधान भुपिंदर सिंह अरोड़ा थे। मोहम्मद वारसी हीर बहुत अच्छा गाते हैं और रास्ते में उनके मीठे बोल हमारे कानों में मिठास घोलते रहे। बीच-बीच में वह हमें इर्द-गिर्द की जानकारी देते रहे।सियालकोट में हम नजीर साहिब के घर ठहरे। सियालकोट से ढाई-तीन किलोमीटर दूर पूरन भक्त के ऐतिहासिक कुंएं का सेवादार है। उसे हमारे आने का पहले से ही मालूम था, इसलिए वह अपने परिवार समेत हमारा इंतकाार कर रहा था। वह 75 वर्ष का सादा मिजाज व्यक्ति था। उसकी पत्नी हमें बहुत अदब से ले गई और कहने लगी कि उसने साठ साल बाद सरदार देखे हैं। उसने बताया कि बंटवारे के वक्त वह दस वर्ष की थी और कुछेक धुंधली यादें अभी भी उसके मन में हैं।नजीर को साथ लेकर हम बाहर निकले, तो बस स्टैंड के पास खान स्वीट शॉप वाले ने हमारा रास्ता रोक लिया। वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और कहने लगा कि मेरी दुकान से लस्सी पीकर कारूर जाना। यही नहीं हमें देखकर इर्द-गिर्द आ पहुंचे लोगों को भी उसने लस्सी पिलाई। लगभग 20-25 गिलास लस्सी उसने पिला दी। बराड़ साहिब ने पैसे देने के लिए पर्स निकाला, तो वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, 'सरदार साहिब, पैसे किसलिए? मैं तो बहुत खुश हुआ हूं अपने भाइयों के दर्शन करके। इसी तरह आते-जाते रहा कीजिए।Ó वह पीछे से पठानकोट का रहने वाला था। बंटवारे का दर्द उसकी आंखों में भी था।हम पूरन के कुंएं के पास पहुंच गए। बहुत बड़े घेरे में वृक्षों के झुंड में यह बहुत ही अद्भुत नकाारा था। नजीर बोला, 'बंटवारे से पहले यहां हकाारों हिंदू आते थे। इस कुंएं की बहुत मान्यता थी। लोग इसका जल अपने घरों में ले जाते थे। इस कुंएं के पानी से नहाने से कई बीमारियों से मुक्ति मिलती है, यह लोगों का मानना था। अब मुस्लिम लोग भी आते हैं।Ó वह बातें कर रहा था, तो मैं उसकी भाषा पर ध्यान दे रहा था। उसकी भाषा से डोगरी बोली की महक आ रही थी। मैंने उसे इसके बारे में पूछा, तो कहने लगा कि जम्मू यहां से कयादा दूर नहीं। शायद इलाके का असर हो।पूरन के कुंएं के नकादीक नानकशाही र्ईंटों से बना हुआ वह कमरा भी है, जिसमें पूरन को कुंएं से निकालकर रखा गया था। नजीर ने अपनी मीठी डोगरी भाषा में पूरन की कथा सुना दी। मैंने कुछ अंश शिव कुमार बटालवी की 'लूणाÓ में से सुनाए। नजीर ने वह जगह दिखाई, जहां राजा सलवान का बाग था। पूरन की अंधी हो चुकी मां इच्छरां भी उसे इसी बाग में मिली थी। पास ही गुरु गोरखनाथ का टिल्ला था। मुझे इन ऐतिहासिक जगहों पर घूमना अच्छा लग रहा था। टिल्ले पर पहुंचकर वारसी से रहा न गया। वह ऊंची आवाका में गाने लगा—तेरे टिल्ले त्तों सूरत दींहदी हीर दी,औह लै वेख गोरखा, उडदी ऊ फुलकारी।
-तलविंदर सिंह
(लेखक पंजाबी कथाकार हैं)

मंगलवार, १९ अगस्त २००८

अव्‍वल आख सुना ख़ुदा ताईं...

कादरयार
पंजाब में 'किस्‍सों' की एक अलग परंपरा है. यह परंपरा साहित्‍य तक ही सीमित नहीं, पंजाबी समाज में भी इसकी जड़ें गहरी हैं. एक समय था, जब पंजाब में मनोरंजन का साधन यह किस्‍से ही हुआ करते थे. चौपालों में इकट्ठे होकर लंबी सद लगाकर इन किस्‍सों को गाया जाता था. मध्‍यकाल में इन किस्‍सों की रचना होती है. कई साहित्‍यकार किस्‍सों के रूप में प्रेम कहानियों को पेश करते रहे. यह प्रेम कहानियां इन किस्‍सों से पहले पंजाबी जन जीवन और जन मानस को प्रभावित कर चुकी थीं.
'किस्‍सा' शब्‍द की उत्‍तपति अरबी भाषा के 'कस' शब्‍द से हुई है, जिसके अर्थ कथा, कहानी या गाथा ही हैं. किसी घटना या कहानी को एक विशेष तरीके से पेश करने को 'किस्‍सा' कहा जाता है. यह कहानी प्रेममय, ऐतिहासक, मिथिहासिक या रोमांचक कोई भी हो सकती है. किस्‍सा मूल रूप में काव्‍य रूप है. दुनिया में प्रसिि‍द्ध प्राप्‍त कर चुके किस्‍से 'हीर राझा की रचना दमोदर ने की थी. इस रचना को पहली प्रमाणिक किस्‍सा रचना होने का श्रेय है. इसके साथ ही पीलू, हाफिज बरखुरदार और अहमद आदि ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया.
कादरयार के बारे में
यहां जिस किस्‍साकार का तआरुफ आपसे कराया जा रहा है, वो है कादरयार.
कादरयार का जन्‍म गांव माछीके, जिला गुजरांवाला (पाकिस्‍तान) में हुआञ कादरयार जाति का संधू जट्ट था. उसकी जन्‍म तिथि के बारे में विद्वानों में मतभेद हैं. परंतु उसकी जन्‍म तिथि का अंदाज़ा उसकी रचना 'महराजनामा' में दिए उसके बयान से लगाया जा सकता है. प्रिंसिपल संत सिंह सेखों के मुताबिक 'महराजनामा' की रचना 1832 ईस्‍वी में हुई. इस हिसाब से वह उनका जन्‍म 1805 ईस्‍वी के नज़दीक मानते हैं. मुसलमान होते हुए भी कारदयार को हिंदू मिथिहास, इतिहास के बारे में भरपूर जानकारी थी. उसने अपने मुरशद लाल शाह से शर्रा की शिक्षा हासिल की. कादरयार की क़ब्र उसके मुरशिद की क़ब्र के पास ही बनाई गई. बताते हैं कि यह क़ब्र अब भी मौजूद है. कादरयार ने 'सोहणी म‍हीवाल', जैसे किस्‍से के अलावा हिंदू मिथिहास पर आधारित किस्‍सा 'राजा रसालू' और 'पूरन भगत' की रचना भी की.
किस्‍सा पूरन भगत पंजाबी जनमानस में रचा बसा किस्‍सा है. इस किस्‍से में वर्णित जगहें वास्‍तव में मिलती हैं. सियालकोट में पूरन के नाम का कुंआ आज भी मौजूद है. यहां किस्‍सा 'पूरन भगत' से कुछ लाइनें आपसे सांझा कर रहा हूं—


अलिफ आख सखी सियालकोट अंदर, पूरन पुत सलवान ने जाया ई.
जदों जम्‍मया राने नूं ख़बर होई, सद पंडितां वेद पड़ाया ई.
बारां बरस ना राजेया मूंह लगीं, देख पंडितां एव फरमाया ई.
कादरयार मियां पूरन भगत ताईं, बाप जम्‍मदेयां ही भोरे पाया ई.