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गुरुवार, 6 अगस्त 2020

अमर प्रेम

मेरे प्रेम
इस उम्र की बात नहीं
Painting by: Sreenivasula Reddy
हर युग में
मैं तुम्हें प्यार करता रहा हूं
रूप कई बनाए होंगे विधाता ने तुम्हारे
कई वेशों में
मैं भी दोहराया गया हूं
बहारों से पूछता कभी पता तुम्हारा
हर मौसम को सजदे करता रहा हूं
िवश्वास था मिलेंगे
कभी किसी जन्म में
वक्त का हर दर्द सहता रहा हूं
इस जन्म की बात नहीं
मेरे प्रेम— 
हर युग में
मैं तुम्हें प्यार करता रहा हूं।  (महिंदरजीत)


अनुवाद: एन नवराही

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

लाल सिंह दिल को याद करते हुए

लाल सिंह दिल 

(11 अप्रैल 1943 से 14अगस्‍त 2007)
पंजाबी जुझारू कविता लहर के इंकलाबी कवि लाल सिंह दिल नक्‍सलबाड़ी लहर से प्रभावित पंजाबी कवियों पाश, संत राम उदासी, संत संधु और अमरजीत चंदन के साथ पंजाबी कविता में नई लीक मारने वाले कवियों में एक थे। दिल ने अपनी कविता के माध्‍यम से समाज के दबे कुचले वर्ग के लोगों का दर्द पेश किया। यह उनका अपना दर्द भी था। ज़ेहनी
तौर पर झेला मानसिक दर्द और दैहिक तौर पर झेला तशदद था, जिसकी टीस उसके रोज़मर्रा के जीवन से हूक बनकर निकलती रही। हम सभी ने उनके साथ हुई बेइंसाफी को महसूस तो किया लेकिन दूर-दूर से। समय गवाह है कि उसने बहत ही मुश्किल समय गुज़ारा, लेकिन हम उसके दर्द में शरीक होने तब आए, जब उसे हमारे सहारे और हमदर्दी की ज़रूरत नहीं रही। आज जब वह नहीं रहा, तो हम उसे श्रद्धांजलि भेंट करने आए हैं। दरअसल हम अब मगरमच्‍छ के आंसू बहाकर एक तरह से अपना फर्ज़ पूरा करने आए हैं। हम जिंदा लोगों के दुख दर्द में शामिल होने के बजाए मढि़या पूजने के आदी बन चुके हैं। जो ज्‍यादतियां साहित्‍य में हो रही हैं, उन्‍हें बंगारने का हम में साहस नहीं है। (यह शब्‍द पंजाबी साहित्‍यकारा सुरजीत कलसी के हैं, जिन्‍होंने लाल सिंह दिल की कविताओं को अंग्रेज़ी में अनुवाद किया था।) यहां प्रस्‍तुत है लाल सिंह दिल की कविताओं का हिन्‍दी अनुवाद
अंग्रेजी अनुवाद के लिए यहां क्लिक करें


वह साँवली औरत

जब कभी ख़ुशी में भरी कहती है--
"मैं बहुत हरामी हूँ !"
वह बहुत कुछ झोंक देती है
मेरी तरह
तारकोल के नीचे जलती आग में
तस्वीरें
क़िताबें
अपनी जुत्ती का पाँव
बन रही छत
और
ईंटें ईंटें ईंटें

---

तुम्हारा युग

जब
बहुत सारे सूरज मर जायेंगे
तब
तुम्हारा युग आएगा
है न?
----
 

काम के बाद

दिन भर की मेहनत के बाद
वे पल्लों से बाँध लेते हैं
अपने बच्चों की दिन भर की मेहनत की कीमत

दो रोटियों की वकालत करते हैं
ख़ुशामदी होते हैं
लौंडे की माँ का हाल बताते हैं
ठहाका लगाते हैं
और चुप्प हो जाते हैं
चले जाते हैं
---

हमारे लिए

हमारे लिए
पेड़ों पर फल नहीं लगते
हमारे लिए
फूल नहीं खिलते
हमारे लिए
बहारें नहीं आतीं

रविवार, 25 मार्च 2012

वो नहीं मिलता मुझे / इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी


वो नहीं मिलता मुझे इसका गिला अपनी जगह
उसके मेरे दरमियाँ फासिला अपनी जगह

ज़िन्दगी के इस सफ़र में सैकड़ों चेहरे मिले
दिल-कशी उनकी अलग, पैकर तेरा अपनी जगह

तुझसे मिल कर आने वाले कल से नफ़रत मोल ली
अब कभी तुझसे ना बिछरूँ ये दुआ अपनी जगह

इस मुसलसल दौड में है मन्ज़िलें और फासिले
पाँव तो अपनी जगह हैं रास्ता अपनी जगह


 अर्थ - (गिला : complaint; दरमियाँ : in between; फासिला : distance), (सफ़र : journey; दिल-कशी : charm; पैकर : benchmark, paradigm), (मुसलसल : continuous; मन्ज़िलें और फासिले : destinations and distances)


शायर परिचय

इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी

इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी आगरा से तालुक रखने वाले शायर सीमाब अकबराबादी के पोते हैं। फिल्म अर्थ की ग़ज़ल, 'तू नहीं तो ज़िंदगी में 
और क्या रह जाएगा' इमाम सिद्दिकी ने ही लिखी है, जिसे जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने गाया है।

शनिवार, 21 मार्च 2009

सुखवंत के शब्‍द रंग

सुखवंत पंजाब के चित्रकार कवि हैं। कागज़ पर शब्‍दों के रंग उकेरते हैं। ज्‍यादा छपने में उनका विश्‍वास नहीं। लिखते हैं और अपनी डायरी में नोट करके संतुष्‍ट रहते हैं। पंजाबी की कई पत्रिकाओं में उनकी पंजाबी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं. अपनी पंजाबी ग़ज़लों की पुस्‍तक की तैयारी में भी लगे हुए हैं. कुछ दिन पहले उनकी डायरी से मुझे हिंदी की कुछ ग़ज़लें मिलीं, तो मैंने उन्‍हें आपके लिए चुरा लिया. उनकी रचनाओं के बारे में उन्‍हीं के शब्‍दों में कहूं तो...
सुखवंत चित्रकार
सुखवंत चित्रकार / Sukhwant Artist



जल रंगों से आग बनाया करता हूं
ओर फिर उसमें जलने से भी डरता हू

आप भी उनके अनुभवों से गुज़रें
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गज़लें/सुखवंत
जम चुकी बर्फ से पानी को उछालूं कैसे।
अपने चेहरे को मैं दर्पण से निकालूं कैसे।

हवा तो रोज़, कभी आंधियां भी चलती हैं,
बदन है रेत की दीवार संभालूं कैसे।

मेरे रंगों में तेरे नक्श उतर सकते हैं,
तेरी आवाज़ को तस्वीर में ढालूं कैसे।

शहर के बारे में अब सोच के चुप रहता हूं,
आग जंगल की है, सीने में लगा लूं कैसे।

मैं तो अब तक यूं ही बेमोल बिका हूं और अब,
अपने कंधों पे यह बाज़ार उठा लूं कैसे।
------

2
होश में हूं पर कुछ कुछ आंखें मीचे हूं।
मस्ती में हंू ना आगे ना पीछे हूं।

मेरा हर इल्ज़ाम मेरे सिर है फिर भी,
जो कुछ हंू मैं कब अपनी मजऱ्ी से हूं।

तेरी ही तस्वीर उभरती है अक्सर,
का$गज़ पे इक खाका जब भी खींचे हूं।

इनमें तब तक फूल व$फा के खिलते हैं,
आंसू से मैं जब-जब आंखें सीचे हूं।

पेड़ तो शायद इस धरती का आंचल हैं,
धूप कड़ी है मैं आंचल के नीचे हूं।

------
3
रोशनी के लिए दीवार में झरोखा है।
यह बात और है इसमें भी कोई धोखा है।

इस चकाचौंध से उभरें तो ज़रा $गौर करें,
इन उजालों ने कहां चांदनी को रोका है।

शो$ख रंगों के तिलिस्म को अंधेरा ना लिखूं,
आज फिर सर्द हवाओं ने मुझे टोका है।

ह$की$कतों की धूप से बचाकर रखता है,
मन की परछाइयों का दर्द भी अनोखा है।

मैंने दीवार गिराई है चलो मान लिया,
मेरे माथे पे मगर कील किसने ठोका है।
-----
4
मन के मौसम को बदल दें सुबह को शाम करें।
अपने साए में कहीं बैठ कर आराम करें।

गुनगुनी धूप के मासूम से उजाले को,
नज़र में ऊंघती अंधी गु$फा के नाम करें।

चलो धरती को फिर से झाड़कर बिछाते हैं,
बेकार फिरने से अच्छा है कोई काम करें।

अब उनके वासते आबो-हवा ही का$फी है,
क्या ज़रूरी है कि नस्लों का $कत्ले-आम करें।

अगर वो सिर है तो छोड़ो वो बिक ही जाएगा,
अगर हैं पैर तो बेड़ी का इंतज़ाम करें।

यह मानते हैं कि रूहें सदा सलामत हैं,
वो इनमें रहती हैं, जिस्मों को भी सलाम करें।

आज की रात चलो म$खमली अंधेरों में,
घरों को छोड़कर सड़कों को बेआराम करें।

--------
5

रास्तों में या अपने घर होगा।
इन अंधेरों में वो किधर होगा।

इस समागम के बाद लगता है,
आग में जल रहा शहर होगा।

चंद लोगों की साजिशों का असर,
क्या $खबर थी कि इस $कदर होगा।

मैं किसी बात से ना डर जाऊं,
उसको इस बात का भी डर होगा।

हादसा फिर भी हादसा है जनाब,
लाख बचिएगा वो मगर होगा।
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संपर्क
मोबाइल- 098720 25360
sukhwantartist@gmail.com

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गुरुवार, 8 जनवरी 2009

मोहब्‍बत भरी दो नज्‍में : डॉ. जगतार


पंजाबी के वरिष्ठ कवि डॉ. जगतार जितना भारतीय पंजाब में प्रसिद्ध हैं, उससे कहीं ज़्यादा उन्हें पाकिस्तानी पंजाब में मान्यता दी जाती है। साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार प्राप्‍त डॉ. जगतार नज्‍म व ग़ज़ल लिखते हैं. उनकी प्रमुख पुस्‍तकों के नाम हैं- प्रवेश द्वार, चनुक्‍करी शाम, जजीरियां विच्‍च घिरिया समुंदर, अधूरा आदमी, लहू के नक्‍श,‍ दुध पत्‍थरी और तलखियां रंगीनियां. ये सभी पुस्‍तकें चेतना प्रकाशन, पंजाबी भवन, लुधियाना, पंजाब द्वारा प्रकाशित पंजाबी पुस्‍तक अणमुक सफर में शामिल हैं. पेश हैं उनकी दो नज्‍में
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रिश्तों के पिंजरे
वह मेरे जिस्म के इस पार झांकी
उस पार झांकी
और कहने लगी,
'तुम मेरे बाप जैसे भी नहीं
जो दारू की नदी तैर कर
डुबो देता है उदासी में घर सारा।
तुम मेरे पति जैसे भी नहीं
जो मेरी रूह तक पहुंचने से पहले ही
बदन में तैर कर
नींद में डूब जाता है।
तुम मेरे भाई जैसे भी नहीं
जो चाहता है
कि मैं बेरंग जीवन ही गुज़ारूं
मगर फिर भी
तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो।
मगर क्या नाम रखूं इस रिश्ते का
मैंने जो रिश्ते जिए, पिंजरे हैं
या कब्रें हैं
या खंडहर हैं।

हैंडल विद केयर
मेरे यहां आने से पहले
वह कॉलेज में थी।
अब भी उसके जिस्म और माज़ी की खुशबू
इस तरह लगता है जैसे
हर जगह मौजूद है।
जो कभी फूलों से, कमरे से
कभी माहौल से आती रहती है।
इस तरह लगता है कभी कैंटीन में
कॉफी की उठ रही भांप में
उसका चेहरा बन रहा है
और कभी लगता है पीरियड समाप्त करके
आ रही है वह उदासी।
और कभी लगता है कि बारिश में
खंबे के साथ लगी
वह किसी का इंतज़ार कर रही है
(किसका?)
मेरी जिंदगी में वह जब हुई दाखिल
मैंने कभी पूछा ही नहीं था।
न ही मेरा है स्वभाव
क्योंकि इस तरह के सवालों से
औरत तिड़क जाती है हमेशा।

पंजाबी से अनुवाद- नव्‍यवेश नवराही

मंगलवार, 12 अगस्त 2008

महमूद दरवेश

फ़लीस्‍तीन के कवि महमूद दरवेश का पिछले दिनों निधन हो गया. वह 67 साल के थे. उनकी कविता फ़लीस्‍तीनी सपनों की आवाज़ है. वह पहले संग्रह 'बिना डैनों की चिडि़या' से ही काफ़ी लोकप्रिय हो गए थे. 1988 में यासिर अराफ़ात ने जो ऐतिहासिक 'आज़ादी का घोषणापत्र' पढ़ा था, वह भी दरवेश का ही लिखा हुआ था. उन्‍हें याद करते हुए कुछ कविताएं यहां दी जा रही हैं. इनका अनुवाद अनिल जनविजय ने किया है.

महमूद दरवेश
महमूद दरवेश


एक आदमी के बारे में

उन्होंने उसके मुँह पर जंज़ीरें कस दीं
मौत की चट्टान से बांध दिया उसे
और कहा- तुम हत्यारे हो

उन्होंने उससे भोजन, कपड़े और अण्डे छीन लिए
फेंक दिया उसे मृत्यु-कक्ष में
और कहा- चोर हो तुम

उसे हर जगह से भगाया उन्होंने
प्यारी छोटी लड़की को छीन लिया
और कहा- शरणार्थी हो तुम, शरणार्थी

अपनी जलती आँखों
और रक्तिम हाथों को बताओ
रात जाएगी
कोई क़ैद, कोई जंज़ीर नहीं रहेगी
नीरो मर गया था रोम नहीं
वह लड़ा था अपनी आँखों से

एक सूखी हुई गेहूँ की बाली के बीज़
भर देंगे खेतों को
करोड़ों-करोड़ हरी बालियों से


गुस्सा

काले हो गए
मेरे दिल के गुलाब
मेरे होठों से निकलीं
ज्वालाएँ वेगवती
क्या जंगल,क्या नर्क
क्या तुम आए हो
तुम सब भूखे शैतान!

हाथ मिलाए थे मैंने
भूख और निर्वासन से
मेरे हाथ क्रोधित हैं
क्रोधित है मेरा चेहरा
मेरी रगों में बहते ख़ून में गुस्सा है
मुझे कसम है अपने दुख की

मुझ से मत चाहो मरमराते गीत
फूल भी जंगली हो गए हैं
इस पराजित जंगल में

मुझे कहने हैं अपने थके हुए शब्द
मेरे पुराने घावों को आराम चाहिए
यही मेरी पीड़ा है

एक अंधा प्रहार रेत पर
और दूसरा बादलों पर
यही बहुत है कि अब मैं क्रोधित हूँ
लेकिन कल आएगी क्रान्ति

आशा

बहुत थोड़ा-सा शहद बाक़ी है
तुम्हारी तश्तरी में
मक्खियों को दूर रखो
और शहद को बचाओ

तुम्हारे घर में अब भी है एक दरवाज़ा
और एक चटाई
दरवाज़ा बन्द कर दो
अपने बच्चों से दूर रखो
ठंडी हवा

यह हवा बेहद ठंडी है
पर बच्चों का सोना ज़रूरी है
तुम्हारे पास शेष है अब भी
आग जलाने के लिए
कुछ लकड़ी
कहवा
और लपटॊं का एक गट्ठर


जाँच-पड़ताल

लिखो-
मैं एक अरब हूँ
कार्ड नम्बर- पचास हज़ार
आठ बच्चों का बाप हूँ
नौवाँ अगली गर्मियों में आएगा
क्या तुम नाराज़ हो?

लिखो-
एक अरब हूँ मैं
पत्थर तोड़ता है
अपने साथी मज़दूरों के साथ

हाँ, मैं तोड़ता हूँ पत्थर
अपने बच्चों को देने के लिए
एक टुकड़ा रोटी
और एक क़िताब

अपने आठ बच्चों के लिए
मैं तुमसे भीख नहीं मांगता
घिघियाता-रिरियाता नहीं तुम्हारे सामने
तुम नाराज़ हो क्या?

लिखो-
अरब हूँ मैं एक
उपाधि-रहित एक नाम
इस उन्मत्त विश्व में अटल हूँ

मेरी जड़ें गहरी हैं
युगों के पार
समय के पार तक
मैं धरती का पुत्र हूँ
विनीत किसानों में से एक

सरकंडे और मिट्टी के बने
झोंपड़े में रहते हूँ
बाल- काले हैं
आँखे- भूरी
मेरी अरबी पगड़ी
जिसमें हाथ डालकर खुजलाता हूँ
पसन्द करता हूँ
सिर पर लगाना चूल्लू भर तेल

इन सब बातों के ऊपर
कृपा करके यह भी लिखो-
मैं किसी से घृणा नहीं करता
लूटता नहीं किसी को
लेकिन जब भूखा होता हूँ मैं
खाना चाहता हूँ गोश्त अपने लुटेरों का
सावधान
सावधान मेरी भूख से
सावधान
मेरे क्रोध से सावधान

सोमवार, 7 जुलाई 2008

एक पुरुष कभी एक स्त्री को नहीं चूमता

मित्र विमल कुमार की यह कविता मेरी पसंदीदा कविताओं में से है। कविता संग्रह 'ये मुखौटा किसका है' और  'सपने में एक औरत से बातचीत'' के जरिए काव्य जगत में शामिल हैं। पेशे से पत्रकार।

एक पुरुष कभी एक स्त्री को नहीं चूमता
Painting by: Mark Yale Harris 

क्योंकि उसके पास एक शरीर था
मेरी बांहों में झूलने से लेकर
आसमान तक उडऩे में
उसके पास वही शरीर था
वही केश-राशि, वही आंखें
पर वह इस यात्रा में कई बार बदल चुकी थी
जैसे आज तक न जाने कितनी बार
उसकी बिंदी बदली थी माथे पर

वह एक ही स्त्री थी
पर कई अर्थ देती थी मुझे
कई पंख देती थी
कई रंग, कई गंध


मैं भीएक ही पुरुष था
क्योंकि एक ही शरीर था मेरे पास
उसे चूमने से लेकर
उसे सताने तक एक ही शरीर
वही भुजाएं, वही जंघाएं
वही दर्प, वही तेज
पर इस यात्रा में मैं भी बदल चुका था कई बार
जैसे कई बार मैं अपना घर बदल चुका था
मैं भी कई अर्थ देता था उसे
कई ध्वनियां, कई फूल
कई पत्थर, कई पुल

वह एक ही स्त्री थी हर बार बदलती हुई
कई हज़ार स्त्रियों को अपने भीतर छुपाए हुए
मैं भी एक ही पुरुष था हर बार बदलता हुआ
अपने भीतर कई हज़ार पुरुषों को छिपाए

इसलिए जब वह मुझसे प्यार करती थी
कई हज़ार स्त्रियां मुझसे प्यार करती थीं
जब वह शिकायत करती थी
कई हज़ार स्त्रियां मुझसे शिकायत करती थीं

जब मैं उसे चूमता था
कई हज़ार पुरुष उसे चूमते थे
जब मैं उससे झगड़ता था
कई हज़ार पुरुष उससे झगड़ते थे

दरअसल एक स्त्री कभी एक पुरुष से प्यार नहीं करती
एक पुरुष भी कभी एक स्त्री को नहीं चूमता
अपने जीवन में


Painter : Mark Yale Harris was Born in Buffalo, New York, He spent his childhood enthralled in a world of drawing and painting. Though honored for creative endeavors.



रविवार, 4 मई 2008

चार छोटी कविताएं/नव्‍यवेश नवराही

तुम हँसती
तुम हँसती-
फूल खिलते
उड़ान भरते हैं पंछी
सुगंधित हो जाती हवा
जब तुम हँसती

खिड़की
आप जिस खिड़की से देख रहे हैं
ज़रूरी नहीं
वो सही ही हो।
देख जाने वाले
उस दृश्य के कई पक्ष
हो गए होंगे औझल
आपकी आँख से।

प्रिय तुम...
प्रिय तुम उदास मत होना
कैसी भी हों राहें, मुश्किलें
अपनी यह निर्दोष मुस्कान
मत खोना
पतझड़ भी तो एक पड़ाव है
किसी अंजान
मंजिल की ओर बढ़ती
हसीन बहार का...
लेकिन तुम धैर्य मत खोना
प्रिय, तुम उदास मत होना।

'हैलो' मंत्र
मन में
जब भी गुस्से की बिजली कौंधती
खून में फैलता नफ़रत का ज़हर
फ़ोन पर
तुम्हारा एक ही शब्द-
'हैलो...'
मंत्र फूँकता
सब हलचलों को शांत कर देता