सुखवंत पंजाब के चित्रकार कवि हैं। कागज़ पर शब्दों के रंग उकेरते हैं। ज्यादा छपने में उनका विश्वास नहीं। लिखते हैं और अपनी डायरी में नोट करके संतुष्ट रहते हैं। पंजाबी की कई पत्रिकाओं में उनकी पंजाबी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं. अपनी पंजाबी ग़ज़लों की पुस्तक की तैयारी में भी लगे हुए हैं. कुछ दिन पहले उनकी डायरी से मुझे हिंदी की कुछ ग़ज़लें मिलीं, तो मैंने उन्हें आपके लिए चुरा लिया. उनकी रचनाओं के बारे में उन्हीं के शब्दों में कहूं तो...
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| सुखवंत चित्रकार / Sukhwant Artist |
जल रंगों से आग बनाया करता हूं
ओर फिर उसमें जलने से भी डरता हूआप भी उनके अनुभवों से गुज़रें
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गज़लें/सुखवंत जम चुकी बर्फ से पानी को उछालूं कैसे।
अपने चेहरे को मैं दर्पण से निकालूं कैसे।
हवा तो रोज़, कभी आंधियां भी चलती हैं,
बदन है रेत की दीवार संभालूं कैसे।
मेरे रंगों में तेरे नक्श उतर सकते हैं,
तेरी आवाज़ को तस्वीर में ढालूं कैसे।
शहर के बारे में अब सोच के चुप रहता हूं,
आग जंगल की है, सीने में लगा लूं कैसे।
मैं तो अब तक यूं ही बेमोल बिका हूं और अब,
अपने कंधों पे यह बाज़ार उठा लूं कैसे।
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2
होश में हूं पर कुछ कुछ आंखें मीचे हूं।
मस्ती में हंू ना आगे ना पीछे हूं।
मेरा हर इल्ज़ाम मेरे सिर है फिर भी,
जो कुछ हंू मैं कब अपनी मजऱ्ी से हूं।
तेरी ही तस्वीर उभरती है अक्सर,
का$गज़ पे इक खाका जब भी खींचे हूं।
इनमें तब तक फूल व$फा के खिलते हैं,
आंसू से मैं जब-जब आंखें सीचे हूं।
पेड़ तो शायद इस धरती का आंचल हैं,
धूप कड़ी है मैं आंचल के नीचे हूं।
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3
रोशनी के लिए दीवार में झरोखा है।
यह बात और है इसमें भी कोई धोखा है।
इस चकाचौंध से उभरें तो ज़रा $गौर करें,
इन उजालों ने कहां चांदनी को रोका है।
शो$ख रंगों के तिलिस्म को अंधेरा ना लिखूं,
आज फिर सर्द हवाओं ने मुझे टोका है।
ह$की$कतों की धूप से बचाकर रखता है,
मन की परछाइयों का दर्द भी अनोखा है।
मैंने दीवार गिराई है चलो मान लिया,
मेरे माथे पे मगर कील किसने ठोका है।
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4
मन के मौसम को बदल दें सुबह को शाम करें।
अपने साए में कहीं बैठ कर आराम करें।
गुनगुनी धूप के मासूम से उजाले को,
नज़र में ऊंघती अंधी गु$फा के नाम करें।
चलो धरती को फिर से झाड़कर बिछाते हैं,
बेकार फिरने से अच्छा है कोई काम करें।
अब उनके वासते आबो-हवा ही का$फी है,
क्या ज़रूरी है कि नस्लों का $कत्ले-आम करें।
अगर वो सिर है तो छोड़ो वो बिक ही जाएगा,
अगर हैं पैर तो बेड़ी का इंतज़ाम करें।
यह मानते हैं कि रूहें सदा सलामत हैं,
वो इनमें रहती हैं, जिस्मों को भी सलाम करें।
आज की रात चलो म$खमली अंधेरों में,
घरों को छोड़कर सड़कों को बेआराम करें।
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5
रास्तों में या अपने घर होगा।
इन अंधेरों में वो किधर होगा।
इस समागम के बाद लगता है,
आग में जल रहा शहर होगा।
चंद लोगों की साजिशों का असर,
क्या $खबर थी कि इस $कदर होगा।
मैं किसी बात से ना डर जाऊं,
उसको इस बात का भी डर होगा।
हादसा फिर भी हादसा है जनाब,
लाख बचिएगा वो मगर होगा।
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