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रविवार, 25 मार्च 2012

वो नहीं मिलता मुझे / इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी


वो नहीं मिलता मुझे इसका गिला अपनी जगह
उसके मेरे दरमियाँ फासिला अपनी जगह

ज़िन्दगी के इस सफ़र में सैकड़ों चेहरे मिले
दिल-कशी उनकी अलग, पैकर तेरा अपनी जगह

तुझसे मिल कर आने वाले कल से नफ़रत मोल ली
अब कभी तुझसे ना बिछरूँ ये दुआ अपनी जगह

इस मुसलसल दौड में है मन्ज़िलें और फासिले
पाँव तो अपनी जगह हैं रास्ता अपनी जगह


 अर्थ - (गिला : complaint; दरमियाँ : in between; फासिला : distance), (सफ़र : journey; दिल-कशी : charm; पैकर : benchmark, paradigm), (मुसलसल : continuous; मन्ज़िलें और फासिले : destinations and distances)


शायर परिचय

इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी

इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी आगरा से तालुक रखने वाले शायर सीमाब अकबराबादी के पोते हैं। फिल्म अर्थ की ग़ज़ल, 'तू नहीं तो ज़िंदगी में 
और क्या रह जाएगा' इमाम सिद्दिकी ने ही लिखी है, जिसे जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने गाया है।

सोमवार, 27 जून 2011

उर्वशी, किसके ‘उर’ बसी


apsara-patrick-klauss

पजाऊपन या बहुत कुछ उत्पन्न करने के अर्थ में उर्वर शब्द हिन्दी में सामान्यतौर पर खूब प्रचलित है। उर्वर बनाने की क्रिया उर्वरण है और उर्वर होने की अवस्था या भाव को उर्वरता कह सकते हैं। धरती पर अन्न उपजानेवाली, अन्नदायिनी के रूप में पृथ्वी को भी उर्वरा कहा जाता है। इसका अर्थ खेती योग्य उपजाऊ ज़मीन भी होता है। इसी कड़ी में उर्वी भी आता है जिसका अर्थ भी धरती है। बांग्ला में यह उरबी है और पूर्वी बोलियों में उर्बि भी है और उरा भी। इसी तरह हृदय, मन या चित्त के लिए हिन्दी और इसकी बोलियों में उर शब्द भी प्रचलित है। जाइज़ संतान के लिए हिन्दी में औरस शब्द प्रचलित है। इन तमाम शब्दों का मूल संस्कृत का उरस् माना जाता है जिसका अर्थ है सीना, छाती, वक्षस्थल, स्तन, हृदय, चित्त आदि। रीतिकालीन साहित्य में स्त्री के अंगों की चर्चा आम बात थी। साहित्यिक हिन्दी में स्त्री के स्तनों के लिए उरसिज या उरोज जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं। पृथ्वी के अर्थ में उर्वी का अर्थ चौड़ा, प्रशस्त, विशाल और सपाट क्षेत्र भी है।
ख्यात भाषाविद् डॉ रामविलास शर्मा लिखते हैं कि संस्कृत में उर शब्द खेत के लिए प्रयुक्त नहीं होता किन्तु उर्वरा खेती लायक भूमि को कहते हैं। इसी उर् से पृथ्वी के लिए उर्वी शब्द बना है। उर्वरता का समृद्धि से रिश्ता है। उरु शब्द का अर्थ है विस्तृत, चौड़ा, विशाल आदि। मोनियर विलियम्स ने भी ग्रीक भाषा का एउरुस् अर्थात प्रशस्त, विशद इसी उरु का प्रतिरूप बताया है। जॉन प्लैट्स के कोश में भी उरु का अर्थ चौड़ा और विस्तृत बताया गया है। डॉ शर्मा कहते कि संस्कत में उर् जैसी कोई क्रिया नहीं है। वे इस संदर्भ में द्रविड़ भाषा परिवार से कुछ उदाहरण देते हुए इस शब्द शृंखला की रिश्तेदारी द्रविड़ भाषाओं से स्थापित करते हैं। तमिल में उळू शब्द जोतने, खंरोचने के लिए प्रयुक्त होता है। किसान के लिए उळवन शब्द है। तुलु में यह ड-कार होकर ऊडूनि, हुडुनि हो जाता है जिसमें जोतने का भाव है। तमिल में उळ का अर्थ है भीतर। उरई का अर्थ है निवास करना। कन्नड़ में उरुवु का अर्थ है विस्तृत, विशद। तुलु में उर्वि, उर्बि का अर्थ है वृद्धि। ये तमाम शब्द उर्वर की उपजाऊ वाली अर्थप्रक्रिया से जुड़ते हैं।
रामविलास जी उर् और ऊर का रिश्ता भारोपीय पुर और पूर से भी जोड़ते हैं जिसमें आश्रय का भाव है, निवास का भाव है जो क्षेत्र में भी है। उर्वि यानी पृथ्वी का अर्थ भी क्षेत्र है। पुर का मूल भारोपीय रूप पोल है। ग्रीक में यह पॉलिस है जिसका अर्थ है नगर। पॉलितेस यानी नागरिक और पॉलितिकोस यानी नागरिक संबंधी। रूसी में यही पोल शब्द खेत की अर्थवत्ता रखता है। ग्रीक में भी पोलोस उस भूमि को कहते हैं जो जोती गई है। स्पष्ट है कि संस्कृत के व्यंजन से जुड़ी गति और चलने की क्रिया ही इस शब्द शृंखला में उभर रही है। भूमि को जोतना यानी चलते हुए उसकी सतह को उलटना-पलटना। संस्कृत का पुर गाँव भी है, नगर भी। बुर्ज, बर्ग भी इसी शृंखला में आते हैं। द्रविड़ भाषा में इसी पुर और पूर में के में बदलने से उर् और ऊर् शब्द मिलते हैं। तंजावुर का वुर इसका उदाहरण है। इनका मूलार्थ संभवतः आवास था। वैसे संस्कृत के उरु में निहित विशद की व्याख्या जंघा या वक्ष में हो जाती है। यही दोनों अंग हैं जो सुविस्तृत होते हैं। इसीलिए उर अगर वक्ष है तो उरु का अर्थ जंघा है। विस्तार के इसी भाव की व्याख्या उर्वी में होती है जिसका अर्थ है पृथ्वी, जिसके अनंत विस्तार को देखकर प्राचीनकाल में मनुष्य चकित होता रहा है। जिस पर विभिन्न जीवों का वास है। साहित्यिक भाषा में उर अर्थात हृदय भी आश्रयस्थली है और सहृदय व्यक्ति के उर में पूरा संसार बसता है। उरस् का रिश्ता दरअसल संस्कृत के से है जिसमें
उर्वी में होती है जिसका अर्थ है पृथ्वी, जिसके अनंत विस्तार को देखकर प्राचीनकाल में मनुष्य चकित होता रहा है। जिस पर विभिन्न जीवों का वास है। साहित्यिक भाषा में उर अर्थात हृदय भी आश्रयस्थली है और सहृदय व्यक्ति के उर में पूरा संसार बसता है।handsf
महान, श्रेष्ठ, अतिशय का भाव है। स्पष्ट है कि महान और बड़ा जैसे भावों से ही विस्तार, विस्तृत जैसे अर्थ विकसित हुए। क्षेत्र के अर्थ में उर्वी शब्द सामने आया। कृषि संस्कृति के विकास के साथ जोतने की क्रिया के लिए उर्वरा जैसा शब्द विकसित हुआ जिसमें भूमि को उलट-पुलट कर खेती लायक बनाने की क्रिया शामिल है। पोषण पाने के भाव को अगर देखें तो इस शब्द शृंखला में स्तनों के लिए उरोज और उरसिज शब्दों का अर्थ स्पष्ट होता है।
डॉ राजबली पाण्डेय हिन्दू धर्मकोश में लिखते हैं कि कृषि भूमि को व्यक्त करने के लिए क्षेत्र के साथ साथ उर्वरा शब्द का प्रयोग भी ऋग्वेद और परवर्ती साहित्य में मिलता है। वैदिककाल में भी खेतों की पैमाइश होती थी। गहरी खेती होती थी साथ ही खाद भी दी जाती थी। आज कृत्रिम या रासायनिक खाद के लिए उर्वरक शब्द खूब प्रचलित है जो इसी कड़ी का हिस्सा है। इन सब बातों का उर्वरता से रिश्ता है। ज़मीन और पशुओं के लिए संघर्ष होते थे जो समूहों के शक्ति परीक्षण की वजह बनते थे। स्वामित्व के झगड़े इन्हीं संघर्षों से ही तय होते थे। इन संदर्भों में उर्वराजित् या उर्वरापति जैसे शब्द उल्लेखनीय हैं जिनमें भूस्वामिन् का भाव है। इस कड़ी का एक अन्य महत्वपूर्ण शब्द है उर्वशी जो स्वर्ग की अप्सरा है और जिसका उल्लेख पौराणिक साहित्य में कई जगहों पर है। एक सामान्य सा अर्थ जो उर्वशी का बताया जाता है वह है पुरुष के हृद्य को वश में कर लेनेवाली- (उर+वशी)। जाहिर है यह अर्थ उर्वशी के अप्सरा होने अर्थात अपार रूप लावण्य की स्वामिनी होने के चलते विकसित हुआ है। दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार नारायणमुनि की जंघा से उत्पन्न होने के कारण उर्वशी को यह नाम मिला। भाव यह है कि जिसका जंघाओं अर्थात उरु में वास हो वह उर्वशी। यह व्युत्पत्ति हरिवंशपुराण में बताई गई है।
(शब्‍दों के सफर से साभार )

शनिवार, 25 जून 2011

प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता

नयनों के डोरे लाल गुलाल-भरी खेली होली !
प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली,
एक वसन रह गई मंद हँस अधर-दशन अनबोली
कली-सी काँटे की तोली !
मधु-ऋतु-रात मधुर अधरों की पी मधुअ सुधबुध खो ली,
खुले अलक मुंद गए पलक-दल श्रम-सुख की हद हो ली-
बनी रति की छवि भोली!

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

अशोक अजनबी पंजाबी और हिंदी में कविता लिखते हैं। पेशे से पत्रकार हैं। अपनी संयुक्‍त काव्‍य पुस्‍तक की तैयारी कर रहे हैं। प्रस्‍तुत है उनकी नई नज्‍म
मैं कल रोऊंगी
(गुमनाम अमरीकी अभिनेत्री लिलियन रॉथ के नाम)
बाल बिखेरे
हाथ फैलाए
मां का मैला आंचल पकड़े
वो लडक़ी बाज़ार गई है
यकीनन
वह लौटेगी
रोती
फफकती
सिसकती
और बिलखती
उसने मां से
बस चाहा था
मां उसको
टॉफी दिलवा दे
मां ने झिडक़ा
नहीं है पैसे
जहर खाने को
कैसे तुमको टॉफी दिलवाऊं?
कल आना साथ तू मेरे
तुमको टॉफी दिलवा हीं दूंगी
बच्ची रो दी
बहुत फफकी थी
बिलखी
और
बहुत सिसकी थी
कितनी बार यही कहा था
मां ने मुझको ऐसे ही टाला था
मन ही मन
कुछ सोच लिया
और चुपके से
मां के पीछे-पीछे चल दी।
आज नहीं
कल रोऊंगी।
मां कल भी
तो ऐसा
ही करेगी।
लगभग एक साल बाद फिर हाजिर हो रहा हूं।

शुक्रवार, 8 मई 2009

धुआं बना कर फिजा में उड़ा दिया हमको

मीर नज़ीर बा$करी जाने-माने शायर हैं। इनकी शायरी को आपने जगजीत सिंह की आवाज़ भी सुना होगा। जगजीत जी की आवाज़ में गाई हुई उनकी $गज़लें रूह की गहराइयों को छूने वाली हैं। कुछ समय पहले वह जालंधर में आए थे। यहां पर हमारी साथी रूहे सना हसन ने उनके साथ गुफ्तगू की। उस गुफ्तगू के साथ-साथ आप उनकी दो रचनाओं को भी गुनगुनाइए...


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ग़ज़लें /मीर नज़ीर बाकरी
है सब नसीब की बातें खता किसी की नहीं
ये जि़ंदगी है बड़ी बेव$फा किसी की नहीं।

तमाम ज$ख्म जो अंदर तो चीखते हैं मगर
हमारे जिस्म से बाहर सदा किसी की नहीं।

वो होंठ सी के मेरे पूछता है चुप क्यों हो
किताबे-ज़ुर्म में ऐसी सज़ा किसी की नहीं।

बड़े-बड़े को उड़ा ले गई है त$ख्त केसाथ
चरा$ग सबके बुझेंगे हवा किसी की नहीं।

'नज़ीरÓ सबकी दुआएं मिली बहुत लेकिन
हमारी मां की दुआ-सी दुआ किसी की नहीं।

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समझकर फूल सी टूटू हुई कुछ पत्तियां उसने
मसल कर फैंक दीं हैं, जाने कितनी तितलियां उसने।

पहनकर अपने हाथों में सुनहरी चूडिय़ां उसने
बढ़ा दी है किसी मज़दूर की बेचेनियां उसने।

किसी इंसान ने उसकी ज़रूरत जबन की पूरी
दरिंदों के हाथें ही बेच दी फिर लड़कियां उसने।

वो एक पंछी जिसे सय्याद ने $कैदी बनाया था
सुना है तोड़ दी सारी कऊस की तीलियां उसने।

हवा ऐसी चली थी सारे घर में $खा$क भर देती
$गनीमत है कि पहले बंद कर ली खिड़कियां उसने।

जलन दिल की बुझाने को भिगोकर अपने अश्$कों से
मेरे सूखे हुए होंठों पे रख दी उंगलियां उसने।

'नज़रÓ अब तो सकून-ए-जि़ंदगी की जुस्तजू छोड़ो
तुम्हारे नाम लिख दी है सभी बेचेनियां उसने।
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गुफ्तगू
वह बेनजीर शायर हैं, क्योंकि उनका नाम है मीर न•ाीर बा$करी। मेरी मुराद उस बेबाक और हौसलेमंद शायर से है, जिसकी शायरी में $ख्यालात का बांकपन तो है, पर ल$फ्जों की बा•ाीगिरी नहीं। वह जो कुछ कहता है, $खूब कहता है। यह वही शायर हैं, जिनकी $ग•ालों को जगजीत सिंह ने अपनी रुहानी आवा•ा देकर एक हंगामा बरपा कर दिया था। सुरों की मल्लिका लता जी ने अपनी आवा•ा में 'धुंआ बना कर फि•ाा में उड़ा दिया मुझकोÓ गाकर उन्हें धुआं बनाकर उड़ाया नहीं, बल्कि सूरज की रोशनी बनाकर हमेशा के लिए अमर कर दिया। आज वही अ•ाीम शायर मेरे रू-ब-रू है। आइए उनसे पूछते हैं कुछ सवाल उनकी •िांदगी और शायरी के स$फर के बारे में-
शायरी कब से शुरू की?
मेरे अंदर शायर कब से सांसे ले रहा था, इसका तो मुझे अंदा•ाा नहीं, मगर हां जब पता चला, तो वह साल 1962 का था। इसी साल मैंने अपना पहला शेर कहा, जो मैं आपको भी सुनाना चाहूंगा-
बाद मुद्दत के बाद सोया हूं $गमों से कह दो
अब कभी आन के मुझको  परेशां करना।

दुनिया के ग्लोबल विलेज बनने के बाद एक शायर सि$र्फ मु$कामी शायर नहीं रह जाता। उसका वास्ता बाहर के मुल्कों के शायरों से भी पड़ता है। ऐसे में आपको हिन्दुस्तान और यहां से बाहर की उर्दू शायरी में क्या $$र्क महसूस होता है?
शायरी के शौ$क की वजह से मुझे इंग्लैंड, अमरीका, दुबई, शारजा, अबु धाबी, मस्कट, कूवैत और दोहा-कतर के अलावा बंग्लादेश और पाकिस्तान जाने का मौ$का मिला। इन मुल्कों में घूमने के बाद मुझे अहसास हुआ कि हिन्दुस्तान में अच्छे शायरों की कमी नहीं है, लेकिन जिन शायरों को मीडिया कवरेज मिल रही है, उनमें वह म्यार नहीं है, जो होना चहिए। पहले शायरी मैसेज देने का •ारिया होती थी, लेकिन अब लोगों ने इसे मनोरंजन का •ारिया बना लिया है। यह माहौल बाहर अभी कम है। वहां लोग मुशायरों में य$कीनी तौर पर अपनी रुहानी गी•ाा, •ाुबान और कल्चर समझ कर शरी$क होते हैं। वहां मुशायरों में आने वाले लोग पढ़े-लिखे होते हैं और हर मुद्दे पर अपनी राय रखते हैं। इसलिए म्यारी शेरों पर म्यारी दाद दी जाती है।

आज हिन्दुस्तान की उर्दू शायरी को किस ार से देखते हैं?
अब शायरी पर प्रोफैश्नलि•म हावी हो रहा है। शायरी ने अपना म्यार $खत्म कर दिया है क्योंकि उसके सामने सुनने वालों के म्यार की मजबूरी थी। उन्हें न हिंदी आती है और न उर्दू। हल्के शेरों पर भी शायर को दाद मिल जाती है। ऐसे में •ाुबान की तबली$ कौन करे?
हिन्दुस्तान में उर्दू का क्या मुस्त$कबिल देखते हैं?
•ाुबान किसी म•ाहब से नहीं पहचानी जाती, लेकिन उर्दू के साथ यह बद$िकस्मती रही कि उसे मुसलमानों के पल्ले बांध दिया गया और मुसलमानों ने उसे अपनाया नहीं। हालत तो यह है कि उर्दू के ठेकेदारों ने भी इससे कुछ इस तरह से मोहब्बत निभाई कि उनकी ओलादें उर्दू से नावाकि$फ हैं।
छोड़कर अपनी •ाुबा सबकी जबानें सीख लीं,
इसी $खता ने हमको अपने घर में गूंगा कर दिया
वैसे पंजाब के लिए उर्दू के दामन को बचाए रखना इतना मुश्किल नहीं है। इसका कारण यह है कि इस •ाुबान के दामन को जीतना इसने भरा है, उसका मु$काबला कोई दूसरा सूबा नहीं कर सकता।

आज देश के राजनीतिक महौल में एक शायर $खुद को कहां पाता है?
इस व$क्त की सबसे बड़ी बदनसीब है कि हमारे पास कोई प्योर पॉलीटिकल शायर नहीं है। आज शायर अपने इर्द-गिर्द का •िाक्र तो करता है, लेकिन उस पर टिप्पणी करने वाला कोई नहीं है। शायद शायर $खुद को अकेला समझ रहा है या हो सकता है वह अपनी सच्चाई का $कत्ल न करना चाहता हो। मुझे भी आप पॉलीटिकल शायर नहीं कह सकते, लेकिन मैंने भी कुछ पॉलीटिकल शेर लिखे हैं-
तुम अपनी रोशनियों पर $गुरूर मत करना
चरा सबके बुझेंगे हवा किसी की नहीं।
अपनी •िांदगी के बारे नें कुछ बताइए।
मैं देश के बड़े सूबों में से एक उत्तर प्रदेश में पीतल नगरी कहे जाने वाले मुरादाबाद से हूं। यहां कभी पृथ्वी राज चौहान की राजधानी रहे तहसील संभल से चौदह किलोमिटर दूर एक गांव है, नेमतपुर, मेरा रिश्ता वहीं से है। मैंने लखनऊ से अपनी पढ़ाई पूरी की, जिस वजह से इसे मैं अपना तालीमी वतन कहता हूं। एक शायर $खुबसूरती में दिलचसपी न ले, ऐसा तो हो नहीं सकता। मैंने भी इस $खुबसूरती को घरों में जगह दी और मुंबई आकर इंटीरियर डैकोरेशन की कंपनी में मैनेजर रहा। मैंने रेडियो सैलून, श्रीलंका के लिए भी कमर्शियल किए।

आपकी $ालों को लोगों ने का$फी पसंद किया है। कई मशहूर लोगों नें भी इन्हें अपनी आवा दी है। इस बारे में हमें कुछ बताइए।
मेरी लिखी $ग•ालों को जगजीत सिंह, लता मंगेशकर, अजी•ा ना•ाा, राज कुमार रि•वी, इंद्रानी रि•वी, गौरव चोपड़ा और शीला वर्मा ने अपनी म$खमली आवा•ाों से सजाया है। जगजीत सिंह की आवा•ा में 'अपनी आंखों के समंदर में उतर जाने दे और 'याद नहीं क्या -क्या देखा था, सारे मं•ार भूल गएÓ और लता जी की आवा•ा में 'धुंआ बना कर फि•ाा में उड़ा दिया मुझकोÓ को लोगों ने काफी पसंद किया है।

पंजाब से आपका ताल्लु कैसा रहा?
पंजाब से मुझे मोहब्बत है। इसी •ामीं ने मुझे अपनी पहचान बनाने में मदद की। 70 के दशक में जब मैंने लिखना शुरू ही किया था, तो यहां से निकलने वाले दो बड़े और मशहूर अ$खबारों ने मुझे का$फी छापा।

दूसरे उभरते शायरों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
शायरी की बुनियाद फिक्र और ओब्सर्वेशन होती है। ओब्सर्वेशन के लिए आपके पास सोच और पढ़ाई होनी चाहिए। इसलिए जितना •यादा किसी दूसरे शायर को पढ़ सकें, उतना ही अच्छा है। कहते भी है कि चरा$ग से चरा$ग जलता है। कहीं ऐसा न हो कि कोई चरा$ग जल ही न सके।

मंगलवार, 31 मार्च 2009

कवि‍यित्री से बातें


युवा
पंजाबी कवियित्री इंद्रजीत नंदन की पुस्तक 'शहीद भगत सिंह : अनथक जीवन गाथा' को साल 2008 के प्रतिष्ठित 'संस्कृति पुरस्कारÓ मिला है। राष्ट्रीय स्तर पर दिया जाने वाला यह पुरस्कार 'संस्कृति प्रतिष्ठान, नई दिल्लीÓ द्वारा अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय युवा प्रतिभाओं को दिया जाता है। पूरे 29 साल बाद यह पुरस्कार पंजाबी को मिला है। पेश है कवियित्री इंद्रजीत नंदन से एक मुलकात...


भगत सिंह के जीवन पर लंबी कविता लिखने की प्रेरणा कहां से मिली?
मैंने 2002 में भगत सिंह पर एक कविता लिखी थी 'फांसी से पहले।Ó यह कविता मेरी पुस्तक 'चुप दे रंग' में शामिल है। इसे लिखते हुए मेरे मन में आया कि शायद मैं भगत सिंह पर नंबी कविता लिख सकती हूं। वह कविता सि$र्फ एक मौ$के के बारे में थी, जब भगत सिंह की अंतिम मुला$कात अपने घर वालों से होती है और $फासी के त$ख्ते तक जाने का इसमें चित्रण था। तभी मुझे महसूस हुआ कि भगत सिंह को समझना/समझाना छोटी कविता के बस की बात नहीं। उसके बाद मैंने भगत सिंह की सोच को समझने के लिए अध्ययन शुरू किया। इसी दौरान २००४ में एक लंबी कविता 'तेरी काया मेरे शब्दÓ लिखी गई। इसके बाद मुझे लगा कि शायद मैं लिख सकती हूं और मैंने इस पर काम शुरू कर दिया। इस पुस्तक को फाइनल करने तक मैंने इसे चार लिखा और तीन साल तक इस पर काम करती रही।

भगत सिंह को ही क्यों चुना?
भगत सिंह पर पंजाबी कविता में उतना काम नहीं हुआ, जितनी बड़ी उस महान शहीद की कुर्बानी और सोच थी। सि$र्फ प्रो दीदार सिंह के $िकस्से के अलावा किसी ने ज़्यादा काम नहीं किया। अगर हुआ भी है, तो वह काल्पनिक या आज के संदर्भ में भगत सिंह के पात्र को चित्रित करके ही हुआ है। दूसरी बात यह भी हो सकता है, मैंने अपनी उम्र की पहली कविता भी भगत सिंह के बारे में लिखी थी और यह बचपन से ही मेरे अवचेतन में कहीं पड़ा हो।

आपने इसे परंपरागत छंद में लिखा है। कोई मुश्किल नहीं आई?
थोड़ी मुश्किल तो आई, क्योंकि ऐतिहासिक तथ्यों को कविता में पिरोना ज़रा मुश्किल होता है। दूसरा, इसे लिखने से पहले मैंने छंदों को सीखा।

इस लंबी कविता के ज़रिए आपने सि$र्फ भगत सिंह की जीवनी ही पेश किया है, जबकि इस संबंध में कई पुस्तकें उपलब्ध हैं। फिर इस पुस्तक की क्या प्रासंगिकता आप देखती हैं?
उपलब्ध पुस्तकों के बारे में यह है कि वे पुस्तकें कविता में उपलब्ध नहीं हैं। जो हैं, वह भगत सिंह की पूरी जि़ंदगी या विचारधारा को पेश नहीं करतीं। मैंने इस पुस्तक में भगत सिंह के पारिवारिक परिदृश्य को बहुत पीछे से समझने और जानने की कोशिश की है। इस परिवेश का भगत सिंह के जीवन पर कितना और कैसा प्रभाव रहा, इसे भी मैंने समझने का प्रयास किया है। बा$की मैं अपने आप को कवियत्री मानती हूं, इसलिए स्वाभाविक है कि कविता ही रचूंगी।

आपकी कविताएं कथित नारीवाद से हटकर औरत की सामाजिक स्थिति और भूमिका के बारे में अलग कोण से बात करती हैं। इसके बारे में कुछ कहना चाहेंगी?
दरअसल, न ही नारीवार से और न ही किसी और वाद से मेरा कोई संबंध है। मैं वादों से मुक्त होकर जीने, विचरण करने और लिखने की आदी हूं। कोई भी वाद मुझे अच्छा नहीं लगता। इसलिए समाज में रहते हुए, जो मैं आंतरिक और बाहरी तौर पर महसूस करती हूं, वही लिखती हूं। मैं इंसान होने पर और इंसानियत में ही भरोसा करती हूं। बा$की ज़रूरी नहीं कि सि$र्फ नारी होने के कारण सभी औरतों का अनुभव एक जैसा ही हो।

कविता और समाज के रिश्ते को कैसे देखती हैं?
कविता समाज से टूटकर नहीं लिखी जा सकती। भले ही आप अंतरमुखी हों या बाहरमुखी, समाज से दूर नहीं हो सकते। मेरे $ख्याल में कवि ज़्यादा संवेदनशील होता है और वह हर घटना को ज़्यादा गहराई से महसूस करता है। जो उसके ज़हन में है, वह कविता में आना स्वभाविक है। भले ही उसमें कल्पना भी शामिल हो, लेकिन पैदा तो विचार से ही हुई है। विचार-प्रक्रिया भी हमारी स्मृतियों का ही हिस्सा है। कवि जो देखेगा, जो बिंब बनेंगे, कविता में आएंगे ही। कवि समाज से बेमुख नहीं हो सकता। कवि और कविता दोनों ही समाज के प्रति जि़म्मेदार हैं।

कविता आपके लिए क्या है?
कविता मेरे लिए जीने का रास्ता है। मैं कविता के बिना अधूरी हूं। इसके बिना मैं जी नहीं सकती या कह लें, कविता ही मेरी जि़ंदगी है।
- नव्यवेश नवराही
(दैनिक भास्‍कर, पंजाब के कला साहित्‍य अंक से साभार)