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शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

इंट्रोवर्ट हैं तो खुद को बिल्कुल न बदलें!


सुजेन केन
प्रोफाइल : लेखक बनने से पहले 7 साल जेपी मॅार्गन और जनरल इलेक्ट्रिक जैसी कंपनियों की कंसल्टेंट थीं।
क्यों पढ़ें: इसे अब तक 35 लाख से ज्यादा लोग विभिन्न वेबसाइट्स पर सुन चुके हैं।



मैं जब 9 साल की थी तब पहली बार समर कैंप में गई। मां ने मेरे लिए जो सूटकेस तैयार किया उसमें किताबें भरी थीं। आप लोगों को शायद ये थोड़ा अजीब लगे लेकिन मेरे परिवार में किताबें पढऩा सबसे जरूरी गतिविधि रही है। मैने दिमाग में छवि बनाई थी कि कैंप में मुझे किताबें पढ़ती कुछ लड़कियां नजर आएंगी। लेकिन जब मैं वहां पहुंची वो किसी पार्टी की तरह लगा। मैं इंतजार कर रही थी कब मुझे वापस कमरे में जाकर किताब पढऩे का मौका मिले। पर जब भी मैं किताब पढऩे जाती तो मुझसे पूछा जाता मैं क्यों उदास हूं। पूरे समर कैंप में मैंने किताबों को देखा तक नहीं। मैंने कैंप में 50 बातें महसूस की जिससे मुझे लगा कि मुझे एक्स्ट्रोवर्ट होना चाहिए। कहीं अंतर्मन में यह बात हमेशा थी कि इंट्रोवट्र्स जैसे हैं उसी रूप में बेहतरीन हैं। पर शायद यह बात मानने में मुझे सालों लग गए इसलिए मै वॉल स्ट्रीट लॉयर बन गई। जबकि मैं हमेशा से लेखक ही बनना चाहती थी। मैनें वो सब किया जो औरों को तो सही लगा,  मुझे नहीं। दुनिया के अधिकांश इंट्रोवट्र्स ऐसा ही करते हैं।

इंट्रोवट्र्स शर्मीले नहीं होते। उनकी अभिव्यक्ति का तरीका अलग होता है। मुझे लगता है हमारे स्कूल और दफ़तर एक्स्ट्रोवट्र्स को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। गणित जैसे विषय, जहां हमें अकेले लडऩा होता है वहां भी ग्रुप असाइनमेंट दिए जाते हैं। मैं आपको बता दूं कि एलिनोर रूजवेल्ट, महात्मा गांधी ने स्वयं को शांत और शर्मीला बताया था। जिनके शरीर का हर अंग स्पॉटलाइट से दूर रहना चाहता था। लेकिन उन्होंने इतिहास रचा। स्टीव वोजनिएक ने पहला एपल कंप्यूटर हैवलेट पैकर्ड में अकेले बैठकर बनाया था।

इसका अर्थ यह नहीं कि हम सारे डार्विन की तरह जंगलों में घूमें। बुद्ध की तरह ख़ुद ही अपनी चीजें खोजिए। ये देखें कि आपके सूटकेस में किताबें हो या कुछ और उन्हें बदलिए मत। इंट्रोवट्र्स आप जैसे हैं उसी मैं आपकी ताकत है। दुनिया को आपकी जरूरत आपके नैसर्गिक रूप में है।  (स्रोत: वर्डप्रेस)

बुधवार, 5 सितंबर 2012

नि:शब्‍द

शिक्षक अपनी कक्षा में पढ़ा रहे थेउसी समय बाहर से ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़े आने लगीं। उत्सुक शिक्षक और विद्यार्थी कक्षा छोड़ कर बाहर आए, देखा कि विद्यालय के ही दो कर्मचारी तू-तू, मैं-मैं करते हुए ऊँची आवाज़ में झगड़ रहे हैं और उनके आसपास भीड़ जमा थी। किसी तरह बीच बचाव कर के विवाद समाप्त किया गया।
Painting Vickie Wade (UK)

शिक्षक और उनके विद्यार्थी वापस अपनी कक्षा में पहुँचे, पर झगड़े का दृश्य देख कर उन सबका मन ख़राब हो चूका था। एक विद्यार्थी ने पूछ ही लिया, "सर, वो दोनों इतनी ज़ोर-ज़ोर से क्यों चिल्ला रहे थे ? इतनी पास से तो धीमी आवाज़ भी सुनी जा सकती थी?

इस पर शिक्षक ने जवाब दिया, "जब किसी को किसी पर ज़ोर से क्रोध आता है, तो उन दोनों के दिलों के बीच की दूरियां बहुत बढ़ जाती हैं। जब दूरियां बढ़ जाती हैं तो ना कुछ दिखाई पड़ता है, ना सुनाई पड़ता है। 

यही कारण है कि लड़ने वाले चिल्ला-चिल्लाकर बात करते हैं। तुम लोगों ने देखा होगा कि जब दो व्यक्तियों में संबंध अच्छे रहते हैं तो वे धीरे-धीरे बात करते हैं और एक-दूसरे की बात इसलिए सुन पाते हैं क्योंकि उनके दिलों के बीच की दूरी बहुत कम होती है। कई बार तो कुछ कहने की भी ज़रूरत नहीं होतीआंखों-आंखों में ही बात हो जाती है। जब दिलों में दूरियां नहीं होंगी तो ना ईर्ष्या होगी और ना ही क्रोध..... फिर क्यों हम किसी पर चिल्लाएंगे...।


शनिवार, 7 जुलाई 2012

अमर प्रेम

महात्मा गांधी और सरला देवी




यह कहानी तो कुछ-कुछ यश चोपड़ा की फिल्म 'कभी कभी' जैसी है। सरला देवी रविंद्र नाथ ठाकुर की भतीजी थीं। उनके पति चौधरी रामभज दत्त आर्य समाज और कांग्रेस में अच्छी पैठ रखते थे। वह जब जेल में थे तो गांधी जी उनकी पत्नी के मेहमान थे, उनके घर में। चार बच्चों के पिता 50 वर्षीय गांधी खूबसूरत सरला देवी पर ऐसे मोहित हुए कि उनका अपना परिवार और राजनीतिक जीवन तक खतरे में आ गया। गांधी जी के पोते के मुताबिक दोनों ओर से मोहब्बत की शिद्दत बराबर थी। गांधी जी ने तो कहा था कि सरला के साथ उनका 'अध्यात्मिक विवाह' हो चुका है। लेकिन दोनों ने ही अपनी आत्मकथा में इस प्रसंग का जिक्र नहीं किया है। आखिर इस प्रेम की परिणति 'कभी कभी' की तरह हुई। सरला के बेटे दीपक चौधरी ने गांधी जी की बेटी से विवाह कर लिया।

जवाहर लाल नेहरू और लेडीमाउंटबेटन




लोग कहते हैं इस लव स्टोरी ने भारत के इतिहास को प्रभावित किया है। लेडी माउंटबेटन की बेटी पामेला ने अपनी एक किताब में लिखा है कि दोनों के बीच रुहानी संबंध था। साथ ही वह यह भी कहती हैं कि कई बार मेरी मौजूदगी उन दोनों के लिए असहजता की स्थिति पैदा कर देती थी। दोनों घंटों तक कमरे में अकेले रहते थे। लॉर्ड माउंटबेटन भी दोनों को अकेला छोड़ देते थे। लेकिन यह साबित कोई नहीं कर पाया कि दोनों में शारीरिक संबंध थे। वैसे कुछ चीजें साबित करने के लिए नहीं होती।
सुभाष चंद्र बोस और एमिली




हाल ही में श्याम बेनेगल ने नेता जी पर फिल्म बनाई तो मुद्दा खड़ा हो गया उनकी शादी का। उससे पहले बहुत कम लोग जानते थे कि नेता जी की शादी हो गई थी। अजीब प्रेम कहानी थी यह भी। एमिली नेता जी की सेक्रेटेरियल असिस्टेंट के रूप में काम करती थीं। उन्हें जर्मन सरकार ने नेता जी पर नजर रखने का हुक्म दिया। इससे नेता जी को चाहने वाली एमिली के सामने नैतिक सवाल खड़ा हो गया। और इसका हल भी उन्होंने खोज लिया, नेता जी से शादी। जर्मन कानून के मुताबिक पत्नी की गवाही मायने नहीं रखती। नेता जी को उनसे एक बेटी भी मिली। इस तरह एक और प्रेम कहानी अमर हो गई।


अडॉल्फ हिटलर और इवा ब्राउन




इतिहास के सबसे बड़े और क्रूर तानाशाह की प्रेमिका होना कोई आसान बात नही। इवा के लिए भी यह आसान नहीं था। एक अमीर बाप की बेटी इवा ब्राउन उस शख्स के प्यार में उस कदर पागल थीं कि उसने कुछ नहीं चाहा। हिटलर ने कभी इवा को सम्मान नहीं दिया, हक नहीं दिया। वह उनके लिए सिर्फ एक इस्तेमाल की चीज बनी रही। लेकिन इवा ने कभी हिटलर को नहीं छोड़ा। साये की तरह वह दीवानी हिटलर का साथ देती रही। और कहते हैं कि जब रूसी फौजें बर्लिन में घुसीं, तो इवा और हिटलर ने एक दूसरे के सामने आत्महत्या कर ली। उफ्फ..क्या लव स्टोरी है।

राजीव और सोनिया गांधी



मोहब्बत कैसे जिंदगी बदल देती है, इसकी कहानी है राजीव और सोनिया की लव स्टोरी। राजीव लंदन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनटी कॉलेज में पढ़ने गए थे। उसी यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ लैग्वेजेज में इटली की एक लड़की पढ़ रही थी। गरीब घर की वह लड़की पढ़ने के लिए पैसे जुटाने के वास्ते एक रेस्ट्रॉन्ट में काम करती थी। राजीव को वह लड़की बहुत पसंद थी। बस, धीरे-धीरे जवां दिल एक-दूजे के हो गए। कैथलिक सोनिया के मां-बाप ने इस रिश्ते का जमकर विरोध किया, तो सोनिया अपनी दुनिया छोड़कर एक नई दुनिया में चली आई अपने महबूब के साथ। फिर उसने देखा राजनीति के नाम होने वाली हत्याओं का खेल। बताते हैं कि सोनिया कभी राजीव को अकेले कहीं नहीं जाने देती थीं। एक बार वह अकेले श्रीलंका चले गए तो उनपर हमला भी हो गया था। एक बार फिर राजीव अकेले चले गए एक रैली में। और फिर लौटकर नहीं आए। सोनिया आज भी वे जिम्मेदारियां निभा रही हैं, जो उनकी मोहब्बत के नाम पर उन्हें मिली हैं।


प्रिंस एडवर्ड और वैलिसा सिंपसन





इश्क के लिए तख्त-ओ-ताज न्योछावर कर देने की मिसाल शायद यहीं से पैदा हुई होगी। प्रिंस यूं तो बांके जवान थे लेकिन शादीशुदा महिलाओं में उनकी खास दिलचस्पी थी। इस दिलचस्पी ने कई कहानियां बनाई। और इसी दिलचस्पी ने उन्हें एक दिन अमेरिका की एक गरीब सी महिला वैलिसा के सामने ला खड़ा किया। दोनों मिले। फिर मिले। बार-बार मिले। और पता नहीं कब प्यार हो गया। प्रिंस एडवर्ड तब ताज संभालने की भी तैयारी कर रहे थे। दोनों के किस्से चर्चित हो गए। सिंपसन ने अपने दूसरे पति को भी तलाक दे दिया। लेकिन यह साफ हो गया कि ब्रिटेन वैलिसा को रानी के रूप में स्वीकार नहीं करेगा। एडवर्ड को मोहब्बत और ताज में से एक चुनना था। उन्होंने मोहब्बत चुनी। कितने ही लोगों को उससे पहले और उसके बाद ताज मिला, किसे याद है। हां, एडवर्ड बहुत से लोगों को याद हैं।


प्रिंस चार्ल्स और कैमिला पार्कर



1970 में एक पोलो मैच में कैमिला और प्रिंस चार्ल्स मिले। कुछ दिन दिल धड़कते रहे और फिर 1972 में जुदा हो गए। प्रिंस ने नेवी जॉइन कर ली और कैमिला ने शादी कर ली। 1981 में प्रिंस की भी शादी हो गई, लेकिन पार्कर से उनका संपर्क बना रहा। 1994 में प्रिंस ने कहा कि अब भी उनके कैमिला से रिश्ते हैं। इससे दोनों शादियां बर्बाद हो गईं। सात महीने बाद ही कैमिला का तलाक हो गया। अगस्त 1996 में प्रिंस और डायना भी अलग हो गए। और 1997 में डायना चल बसीं। आखिरकार 2005 में दो प्रेमी मिल ही गए। 25 साल बाद मोहब्बत अपने अंजाम पर थी।

नैपोलियन और जोसेफिन



नैपोलियन के एक अफसर बरास की पत्नी थी रोज। नैपोलियन तब पत्नी की खोज में था और बरास रोज से छुटकारा चाहता था। उसने रोज को नेपोलियन की तारीफ करने और उसके साथ रहने को कहा। रोज की थोड़ी सी लुभावनी बातों से नैपोलियन पिघल गया। उसे प्यार हो गया। बरास ने रोज को कहा कि मैं तुम्हें छोड़ दूंगा तो तुम सड़क पर आ जाओगी, इसलिए नैपोलियन से शादी कर लो। मजबूरी में रोज ने नैपोलियन से शादी कर ली। नैपोलियन ने ही उसे जोसेफिन नाम दिया। लेकिन जोसेफिन तो नैपोलियन को नहीं चाहती थी। जब नैपोलियन लड़ाई के लिए इटली गया तो वह फ्रांस में ही रह गई। पीछे से उसने अपनी अय्याशियां शुरी कर दी। नैपोलियन ने उसे कई बार अपने पास बुलाया, लेकिन वह रोज नए बहाने बना देती। उसने यहां तक कह दिया कि मैं प्रेग्नेंट हूं इसलिए नहीं आ सकती। जब बरास को लगा कि नैपोलियन इसके चक्कर में लड़ाई छोड़कर ना आ जाए तो उसने जबर्दस्ती जोसेफिन को इटली भेजा। जोसेफिन ने नैपोलियन से कहा कि रास्ते में उसका गर्भ गिर गया। नैपोलियन फूट-फूट कर रोया। कुछ दिन बाद नई लड़ाई के लिए वह फिर फ्रांस से बाहर चला गया और जोसेफिन की अय्याशियां शुरू हो गई। और जो होना था, एक दिन नैपोलियन को पता चल गया। वह फ्रांस लौटा। उसने कहा कि तुमने मेरा दिल तोड़ा है। अब मैं किसी से कभी प्यार नहीं कर पाऊंगा। जोसेफिन शर्म से पानी-पानी हो गई। उसके बाद जिंदगी पलट गई। ताउम्र जोसेफिन नैपोलियन के प्यार में मरती रही और नैपोलियन अय्याश हो गया। आखिर तक उसने जोसेफिन को माफ नहीं किया।


एंटनी और
क्लियोपेट्रा




क्लियोपेट्रा रोम के सम्राट जूलियस सीजर की रखैल थी। बताते हैं कि इतिहास की सबसे मशहूर औरतों में से एक क्लियो मैथ्स की विद्वान थी और 9 भाषाएं जानती थी। उसकी इंटेलिजेंस और नॉलेज का सीजर भी कायल था। वही क्लियोपेट्रा सीजर एक दोस्त एंटनी को दिल दे बैठी। दोनों एक-दूसरे के दीवाने हो गए थे। लेकिन राजनीति को यह मोहब्बत मंजूर नहीं थी। मिस्र की बढ़ती ताकत से परेशान रोम के लोग मिस्र की एक औरत को एंटनी की पत्नी बनते नहीं देखना चाहते थे। इसलिए साजिश रची गई। एंटनी को लड़ाई के दौरान झूठी खबर दी गई कि क्लियोपेट्रा नहीं रही। खबर सुनते ही एंटनी सदमे में आ गया और अपनी तलवार पर गिरकर मर गया। यह खबर जब क्लियोपेट्रा को मिली, तो उसने खुद को एक जहरीले सांप के आगे डाल दिया। सांप के जहर से फौरन उसकी मौत हो गई। मोहब्बत करने वाले शहीद हो गए, मोहब्बत आज भी जिंदा है।



शाहजहां और मुमताज



सन 1612 में 15 साल के मुगल शहजादे ने एक और शादी की। लड़की थी अर्जुमंद बानो। यूं तो उसके बाद भी शहजादे ने कई शादियां कीं, लेकिन बानो में कुछ ऐसा था कि शहजादा उसका दीवाना था। उसने बानो को नाम दिया था। मुमताज। 1629 में मुमताज की बच्चे को जन्म देते हुए मौत हो गई। उससे पहले वह 14 बच्चों को जन्म दे चुकी थीं। मुमताज की मौत ने शाहजहां को हिलाकर रख दिया। उसने खुद को कमरे में बंद कर लिया। कई दिन बाद जब बादशाह बाहर निकला, तो वह बूढ़ा हो चुका था। उसके बाद उसके सिर पर बस मुमताज को अमर कर देने की धुन सवार हो गई। उसने दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारत बनाने का हुक्म जारी कर दिया। 20 हजार लोग और एक हजार हाथी 20 साल तक लगातार काम करते रहे और तब जाकर वह इमारत खड़ी हुई, जिसे लोग ताजमहल कहते हैं। फिर शाहजहां भी चल बसा। मोहब्बत अमर हो गई

चलो ना !


 




















चलो ना !
कुछ भी बात करते हैं
ऐसे चुप से तो फांसले बढ़ते हैं....

बस यूं ही...
कुछ भी,
कुछ भी, बात करते हैं....

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

फाल्गुनी




















पांच पीले वासंती फूल नहीं,
तुमने मुझे दिए पांच
अनकहे खूबसूरत एहसास
जो अब हर वसंत में
मुझे मेरी नजर में बनाएंगे सबसे खास
फूलों के साथ
तुम मुस्कुराओगे
मेरे आस-पास...

रविवार, 25 मार्च 2012

वो नहीं मिलता मुझे / इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी


वो नहीं मिलता मुझे इसका गिला अपनी जगह
उसके मेरे दरमियाँ फासिला अपनी जगह

ज़िन्दगी के इस सफ़र में सैकड़ों चेहरे मिले
दिल-कशी उनकी अलग, पैकर तेरा अपनी जगह

तुझसे मिल कर आने वाले कल से नफ़रत मोल ली
अब कभी तुझसे ना बिछरूँ ये दुआ अपनी जगह

इस मुसलसल दौड में है मन्ज़िलें और फासिले
पाँव तो अपनी जगह हैं रास्ता अपनी जगह


 अर्थ - (गिला : complaint; दरमियाँ : in between; फासिला : distance), (सफ़र : journey; दिल-कशी : charm; पैकर : benchmark, paradigm), (मुसलसल : continuous; मन्ज़िलें और फासिले : destinations and distances)


शायर परिचय

इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी

इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी आगरा से तालुक रखने वाले शायर सीमाब अकबराबादी के पोते हैं। फिल्म अर्थ की ग़ज़ल, 'तू नहीं तो ज़िंदगी में 
और क्या रह जाएगा' इमाम सिद्दिकी ने ही लिखी है, जिसे जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने गाया है।

सोमवार, 27 जून 2011

उर्वशी, किसके ‘उर’ बसी


apsara-patrick-klauss

पजाऊपन या बहुत कुछ उत्पन्न करने के अर्थ में उर्वर शब्द हिन्दी में सामान्यतौर पर खूब प्रचलित है। उर्वर बनाने की क्रिया उर्वरण है और उर्वर होने की अवस्था या भाव को उर्वरता कह सकते हैं। धरती पर अन्न उपजानेवाली, अन्नदायिनी के रूप में पृथ्वी को भी उर्वरा कहा जाता है। इसका अर्थ खेती योग्य उपजाऊ ज़मीन भी होता है। इसी कड़ी में उर्वी भी आता है जिसका अर्थ भी धरती है। बांग्ला में यह उरबी है और पूर्वी बोलियों में उर्बि भी है और उरा भी। इसी तरह हृदय, मन या चित्त के लिए हिन्दी और इसकी बोलियों में उर शब्द भी प्रचलित है। जाइज़ संतान के लिए हिन्दी में औरस शब्द प्रचलित है। इन तमाम शब्दों का मूल संस्कृत का उरस् माना जाता है जिसका अर्थ है सीना, छाती, वक्षस्थल, स्तन, हृदय, चित्त आदि। रीतिकालीन साहित्य में स्त्री के अंगों की चर्चा आम बात थी। साहित्यिक हिन्दी में स्त्री के स्तनों के लिए उरसिज या उरोज जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं। पृथ्वी के अर्थ में उर्वी का अर्थ चौड़ा, प्रशस्त, विशाल और सपाट क्षेत्र भी है।
ख्यात भाषाविद् डॉ रामविलास शर्मा लिखते हैं कि संस्कृत में उर शब्द खेत के लिए प्रयुक्त नहीं होता किन्तु उर्वरा खेती लायक भूमि को कहते हैं। इसी उर् से पृथ्वी के लिए उर्वी शब्द बना है। उर्वरता का समृद्धि से रिश्ता है। उरु शब्द का अर्थ है विस्तृत, चौड़ा, विशाल आदि। मोनियर विलियम्स ने भी ग्रीक भाषा का एउरुस् अर्थात प्रशस्त, विशद इसी उरु का प्रतिरूप बताया है। जॉन प्लैट्स के कोश में भी उरु का अर्थ चौड़ा और विस्तृत बताया गया है। डॉ शर्मा कहते कि संस्कत में उर् जैसी कोई क्रिया नहीं है। वे इस संदर्भ में द्रविड़ भाषा परिवार से कुछ उदाहरण देते हुए इस शब्द शृंखला की रिश्तेदारी द्रविड़ भाषाओं से स्थापित करते हैं। तमिल में उळू शब्द जोतने, खंरोचने के लिए प्रयुक्त होता है। किसान के लिए उळवन शब्द है। तुलु में यह ड-कार होकर ऊडूनि, हुडुनि हो जाता है जिसमें जोतने का भाव है। तमिल में उळ का अर्थ है भीतर। उरई का अर्थ है निवास करना। कन्नड़ में उरुवु का अर्थ है विस्तृत, विशद। तुलु में उर्वि, उर्बि का अर्थ है वृद्धि। ये तमाम शब्द उर्वर की उपजाऊ वाली अर्थप्रक्रिया से जुड़ते हैं।
रामविलास जी उर् और ऊर का रिश्ता भारोपीय पुर और पूर से भी जोड़ते हैं जिसमें आश्रय का भाव है, निवास का भाव है जो क्षेत्र में भी है। उर्वि यानी पृथ्वी का अर्थ भी क्षेत्र है। पुर का मूल भारोपीय रूप पोल है। ग्रीक में यह पॉलिस है जिसका अर्थ है नगर। पॉलितेस यानी नागरिक और पॉलितिकोस यानी नागरिक संबंधी। रूसी में यही पोल शब्द खेत की अर्थवत्ता रखता है। ग्रीक में भी पोलोस उस भूमि को कहते हैं जो जोती गई है। स्पष्ट है कि संस्कृत के व्यंजन से जुड़ी गति और चलने की क्रिया ही इस शब्द शृंखला में उभर रही है। भूमि को जोतना यानी चलते हुए उसकी सतह को उलटना-पलटना। संस्कृत का पुर गाँव भी है, नगर भी। बुर्ज, बर्ग भी इसी शृंखला में आते हैं। द्रविड़ भाषा में इसी पुर और पूर में के में बदलने से उर् और ऊर् शब्द मिलते हैं। तंजावुर का वुर इसका उदाहरण है। इनका मूलार्थ संभवतः आवास था। वैसे संस्कृत के उरु में निहित विशद की व्याख्या जंघा या वक्ष में हो जाती है। यही दोनों अंग हैं जो सुविस्तृत होते हैं। इसीलिए उर अगर वक्ष है तो उरु का अर्थ जंघा है। विस्तार के इसी भाव की व्याख्या उर्वी में होती है जिसका अर्थ है पृथ्वी, जिसके अनंत विस्तार को देखकर प्राचीनकाल में मनुष्य चकित होता रहा है। जिस पर विभिन्न जीवों का वास है। साहित्यिक भाषा में उर अर्थात हृदय भी आश्रयस्थली है और सहृदय व्यक्ति के उर में पूरा संसार बसता है। उरस् का रिश्ता दरअसल संस्कृत के से है जिसमें
उर्वी में होती है जिसका अर्थ है पृथ्वी, जिसके अनंत विस्तार को देखकर प्राचीनकाल में मनुष्य चकित होता रहा है। जिस पर विभिन्न जीवों का वास है। साहित्यिक भाषा में उर अर्थात हृदय भी आश्रयस्थली है और सहृदय व्यक्ति के उर में पूरा संसार बसता है।handsf
महान, श्रेष्ठ, अतिशय का भाव है। स्पष्ट है कि महान और बड़ा जैसे भावों से ही विस्तार, विस्तृत जैसे अर्थ विकसित हुए। क्षेत्र के अर्थ में उर्वी शब्द सामने आया। कृषि संस्कृति के विकास के साथ जोतने की क्रिया के लिए उर्वरा जैसा शब्द विकसित हुआ जिसमें भूमि को उलट-पुलट कर खेती लायक बनाने की क्रिया शामिल है। पोषण पाने के भाव को अगर देखें तो इस शब्द शृंखला में स्तनों के लिए उरोज और उरसिज शब्दों का अर्थ स्पष्ट होता है।
डॉ राजबली पाण्डेय हिन्दू धर्मकोश में लिखते हैं कि कृषि भूमि को व्यक्त करने के लिए क्षेत्र के साथ साथ उर्वरा शब्द का प्रयोग भी ऋग्वेद और परवर्ती साहित्य में मिलता है। वैदिककाल में भी खेतों की पैमाइश होती थी। गहरी खेती होती थी साथ ही खाद भी दी जाती थी। आज कृत्रिम या रासायनिक खाद के लिए उर्वरक शब्द खूब प्रचलित है जो इसी कड़ी का हिस्सा है। इन सब बातों का उर्वरता से रिश्ता है। ज़मीन और पशुओं के लिए संघर्ष होते थे जो समूहों के शक्ति परीक्षण की वजह बनते थे। स्वामित्व के झगड़े इन्हीं संघर्षों से ही तय होते थे। इन संदर्भों में उर्वराजित् या उर्वरापति जैसे शब्द उल्लेखनीय हैं जिनमें भूस्वामिन् का भाव है। इस कड़ी का एक अन्य महत्वपूर्ण शब्द है उर्वशी जो स्वर्ग की अप्सरा है और जिसका उल्लेख पौराणिक साहित्य में कई जगहों पर है। एक सामान्य सा अर्थ जो उर्वशी का बताया जाता है वह है पुरुष के हृद्य को वश में कर लेनेवाली- (उर+वशी)। जाहिर है यह अर्थ उर्वशी के अप्सरा होने अर्थात अपार रूप लावण्य की स्वामिनी होने के चलते विकसित हुआ है। दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार नारायणमुनि की जंघा से उत्पन्न होने के कारण उर्वशी को यह नाम मिला। भाव यह है कि जिसका जंघाओं अर्थात उरु में वास हो वह उर्वशी। यह व्युत्पत्ति हरिवंशपुराण में बताई गई है।
(शब्‍दों के सफर से साभार )

शनिवार, 25 जून 2011

प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता

नयनों के डोरे लाल गुलाल-भरी खेली होली !
प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली,
एक वसन रह गई मंद हँस अधर-दशन अनबोली
कली-सी काँटे की तोली !
मधु-ऋतु-रात मधुर अधरों की पी मधुअ सुधबुध खो ली,
खुले अलक मुंद गए पलक-दल श्रम-सुख की हद हो ली-
बनी रति की छवि भोली!

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

अशोक अजनबी पंजाबी और हिंदी में कविता लिखते हैं। पेशे से पत्रकार हैं। अपनी संयुक्‍त काव्‍य पुस्‍तक की तैयारी कर रहे हैं। प्रस्‍तुत है उनकी नई नज्‍म
मैं कल रोऊंगी
(गुमनाम अमरीकी अभिनेत्री लिलियन रॉथ के नाम)
बाल बिखेरे
हाथ फैलाए
मां का मैला आंचल पकड़े
वो लडक़ी बाज़ार गई है
यकीनन
वह लौटेगी
रोती
फफकती
सिसकती
और बिलखती
उसने मां से
बस चाहा था
मां उसको
टॉफी दिलवा दे
मां ने झिडक़ा
नहीं है पैसे
जहर खाने को
कैसे तुमको टॉफी दिलवाऊं?
कल आना साथ तू मेरे
तुमको टॉफी दिलवा हीं दूंगी
बच्ची रो दी
बहुत फफकी थी
बिलखी
और
बहुत सिसकी थी
कितनी बार यही कहा था
मां ने मुझको ऐसे ही टाला था
मन ही मन
कुछ सोच लिया
और चुपके से
मां के पीछे-पीछे चल दी।
आज नहीं
कल रोऊंगी।
मां कल भी
तो ऐसा
ही करेगी।
लगभग एक साल बाद फिर हाजिर हो रहा हूं।

शुक्रवार, 8 मई 2009

धुआं बना कर फिजा में उड़ा दिया हमको

मीर नज़ीर बा$करी जाने-माने शायर हैं। इनकी शायरी को आपने जगजीत सिंह की आवाज़ भी सुना होगा। जगजीत जी की आवाज़ में गाई हुई उनकी $गज़लें रूह की गहराइयों को छूने वाली हैं। कुछ समय पहले वह जालंधर में आए थे। यहां पर हमारी साथी रूहे सना हसन ने उनके साथ गुफ्तगू की। उस गुफ्तगू के साथ-साथ आप उनकी दो रचनाओं को भी गुनगुनाइए...


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ग़ज़लें /मीर नज़ीर बाकरी
है सब नसीब की बातें खता किसी की नहीं
ये जि़ंदगी है बड़ी बेव$फा किसी की नहीं।

तमाम ज$ख्म जो अंदर तो चीखते हैं मगर
हमारे जिस्म से बाहर सदा किसी की नहीं।

वो होंठ सी के मेरे पूछता है चुप क्यों हो
किताबे-ज़ुर्म में ऐसी सज़ा किसी की नहीं।

बड़े-बड़े को उड़ा ले गई है त$ख्त केसाथ
चरा$ग सबके बुझेंगे हवा किसी की नहीं।

'नज़ीरÓ सबकी दुआएं मिली बहुत लेकिन
हमारी मां की दुआ-सी दुआ किसी की नहीं।

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समझकर फूल सी टूटू हुई कुछ पत्तियां उसने
मसल कर फैंक दीं हैं, जाने कितनी तितलियां उसने।

पहनकर अपने हाथों में सुनहरी चूडिय़ां उसने
बढ़ा दी है किसी मज़दूर की बेचेनियां उसने।

किसी इंसान ने उसकी ज़रूरत जबन की पूरी
दरिंदों के हाथें ही बेच दी फिर लड़कियां उसने।

वो एक पंछी जिसे सय्याद ने $कैदी बनाया था
सुना है तोड़ दी सारी कऊस की तीलियां उसने।

हवा ऐसी चली थी सारे घर में $खा$क भर देती
$गनीमत है कि पहले बंद कर ली खिड़कियां उसने।

जलन दिल की बुझाने को भिगोकर अपने अश्$कों से
मेरे सूखे हुए होंठों पे रख दी उंगलियां उसने।

'नज़रÓ अब तो सकून-ए-जि़ंदगी की जुस्तजू छोड़ो
तुम्हारे नाम लिख दी है सभी बेचेनियां उसने।
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गुफ्तगू
वह बेनजीर शायर हैं, क्योंकि उनका नाम है मीर न•ाीर बा$करी। मेरी मुराद उस बेबाक और हौसलेमंद शायर से है, जिसकी शायरी में $ख्यालात का बांकपन तो है, पर ल$फ्जों की बा•ाीगिरी नहीं। वह जो कुछ कहता है, $खूब कहता है। यह वही शायर हैं, जिनकी $ग•ालों को जगजीत सिंह ने अपनी रुहानी आवा•ा देकर एक हंगामा बरपा कर दिया था। सुरों की मल्लिका लता जी ने अपनी आवा•ा में 'धुंआ बना कर फि•ाा में उड़ा दिया मुझकोÓ गाकर उन्हें धुआं बनाकर उड़ाया नहीं, बल्कि सूरज की रोशनी बनाकर हमेशा के लिए अमर कर दिया। आज वही अ•ाीम शायर मेरे रू-ब-रू है। आइए उनसे पूछते हैं कुछ सवाल उनकी •िांदगी और शायरी के स$फर के बारे में-
शायरी कब से शुरू की?
मेरे अंदर शायर कब से सांसे ले रहा था, इसका तो मुझे अंदा•ाा नहीं, मगर हां जब पता चला, तो वह साल 1962 का था। इसी साल मैंने अपना पहला शेर कहा, जो मैं आपको भी सुनाना चाहूंगा-
बाद मुद्दत के बाद सोया हूं $गमों से कह दो
अब कभी आन के मुझको  परेशां करना।

दुनिया के ग्लोबल विलेज बनने के बाद एक शायर सि$र्फ मु$कामी शायर नहीं रह जाता। उसका वास्ता बाहर के मुल्कों के शायरों से भी पड़ता है। ऐसे में आपको हिन्दुस्तान और यहां से बाहर की उर्दू शायरी में क्या $$र्क महसूस होता है?
शायरी के शौ$क की वजह से मुझे इंग्लैंड, अमरीका, दुबई, शारजा, अबु धाबी, मस्कट, कूवैत और दोहा-कतर के अलावा बंग्लादेश और पाकिस्तान जाने का मौ$का मिला। इन मुल्कों में घूमने के बाद मुझे अहसास हुआ कि हिन्दुस्तान में अच्छे शायरों की कमी नहीं है, लेकिन जिन शायरों को मीडिया कवरेज मिल रही है, उनमें वह म्यार नहीं है, जो होना चहिए। पहले शायरी मैसेज देने का •ारिया होती थी, लेकिन अब लोगों ने इसे मनोरंजन का •ारिया बना लिया है। यह माहौल बाहर अभी कम है। वहां लोग मुशायरों में य$कीनी तौर पर अपनी रुहानी गी•ाा, •ाुबान और कल्चर समझ कर शरी$क होते हैं। वहां मुशायरों में आने वाले लोग पढ़े-लिखे होते हैं और हर मुद्दे पर अपनी राय रखते हैं। इसलिए म्यारी शेरों पर म्यारी दाद दी जाती है।

आज हिन्दुस्तान की उर्दू शायरी को किस ार से देखते हैं?
अब शायरी पर प्रोफैश्नलि•म हावी हो रहा है। शायरी ने अपना म्यार $खत्म कर दिया है क्योंकि उसके सामने सुनने वालों के म्यार की मजबूरी थी। उन्हें न हिंदी आती है और न उर्दू। हल्के शेरों पर भी शायर को दाद मिल जाती है। ऐसे में •ाुबान की तबली$ कौन करे?
हिन्दुस्तान में उर्दू का क्या मुस्त$कबिल देखते हैं?
•ाुबान किसी म•ाहब से नहीं पहचानी जाती, लेकिन उर्दू के साथ यह बद$िकस्मती रही कि उसे मुसलमानों के पल्ले बांध दिया गया और मुसलमानों ने उसे अपनाया नहीं। हालत तो यह है कि उर्दू के ठेकेदारों ने भी इससे कुछ इस तरह से मोहब्बत निभाई कि उनकी ओलादें उर्दू से नावाकि$फ हैं।
छोड़कर अपनी •ाुबा सबकी जबानें सीख लीं,
इसी $खता ने हमको अपने घर में गूंगा कर दिया
वैसे पंजाब के लिए उर्दू के दामन को बचाए रखना इतना मुश्किल नहीं है। इसका कारण यह है कि इस •ाुबान के दामन को जीतना इसने भरा है, उसका मु$काबला कोई दूसरा सूबा नहीं कर सकता।

आज देश के राजनीतिक महौल में एक शायर $खुद को कहां पाता है?
इस व$क्त की सबसे बड़ी बदनसीब है कि हमारे पास कोई प्योर पॉलीटिकल शायर नहीं है। आज शायर अपने इर्द-गिर्द का •िाक्र तो करता है, लेकिन उस पर टिप्पणी करने वाला कोई नहीं है। शायद शायर $खुद को अकेला समझ रहा है या हो सकता है वह अपनी सच्चाई का $कत्ल न करना चाहता हो। मुझे भी आप पॉलीटिकल शायर नहीं कह सकते, लेकिन मैंने भी कुछ पॉलीटिकल शेर लिखे हैं-
तुम अपनी रोशनियों पर $गुरूर मत करना
चरा सबके बुझेंगे हवा किसी की नहीं।
अपनी •िांदगी के बारे नें कुछ बताइए।
मैं देश के बड़े सूबों में से एक उत्तर प्रदेश में पीतल नगरी कहे जाने वाले मुरादाबाद से हूं। यहां कभी पृथ्वी राज चौहान की राजधानी रहे तहसील संभल से चौदह किलोमिटर दूर एक गांव है, नेमतपुर, मेरा रिश्ता वहीं से है। मैंने लखनऊ से अपनी पढ़ाई पूरी की, जिस वजह से इसे मैं अपना तालीमी वतन कहता हूं। एक शायर $खुबसूरती में दिलचसपी न ले, ऐसा तो हो नहीं सकता। मैंने भी इस $खुबसूरती को घरों में जगह दी और मुंबई आकर इंटीरियर डैकोरेशन की कंपनी में मैनेजर रहा। मैंने रेडियो सैलून, श्रीलंका के लिए भी कमर्शियल किए।

आपकी $ालों को लोगों ने का$फी पसंद किया है। कई मशहूर लोगों नें भी इन्हें अपनी आवा दी है। इस बारे में हमें कुछ बताइए।
मेरी लिखी $ग•ालों को जगजीत सिंह, लता मंगेशकर, अजी•ा ना•ाा, राज कुमार रि•वी, इंद्रानी रि•वी, गौरव चोपड़ा और शीला वर्मा ने अपनी म$खमली आवा•ाों से सजाया है। जगजीत सिंह की आवा•ा में 'अपनी आंखों के समंदर में उतर जाने दे और 'याद नहीं क्या -क्या देखा था, सारे मं•ार भूल गएÓ और लता जी की आवा•ा में 'धुंआ बना कर फि•ाा में उड़ा दिया मुझकोÓ को लोगों ने काफी पसंद किया है।

पंजाब से आपका ताल्लु कैसा रहा?
पंजाब से मुझे मोहब्बत है। इसी •ामीं ने मुझे अपनी पहचान बनाने में मदद की। 70 के दशक में जब मैंने लिखना शुरू ही किया था, तो यहां से निकलने वाले दो बड़े और मशहूर अ$खबारों ने मुझे का$फी छापा।

दूसरे उभरते शायरों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
शायरी की बुनियाद फिक्र और ओब्सर्वेशन होती है। ओब्सर्वेशन के लिए आपके पास सोच और पढ़ाई होनी चाहिए। इसलिए जितना •यादा किसी दूसरे शायर को पढ़ सकें, उतना ही अच्छा है। कहते भी है कि चरा$ग से चरा$ग जलता है। कहीं ऐसा न हो कि कोई चरा$ग जल ही न सके।