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शनिवार, 12 अप्रैल 2014

लाल सिंह दिल को याद करते हुए

लाल सिंह दिल 

(11 अप्रैल 1943 से 14अगस्‍त 2007)
पंजाबी जुझारू कविता लहर के इंकलाबी कवि लाल सिंह दिल नक्‍सलबाड़ी लहर से प्रभावित पंजाबी कवियों पाश, संत राम उदासी, संत संधु और अमरजीत चंदन के साथ पंजाबी कविता में नई लीक मारने वाले कवियों में एक थे। दिल ने अपनी कविता के माध्‍यम से समाज के दबे कुचले वर्ग के लोगों का दर्द पेश किया। यह उनका अपना दर्द भी था। ज़ेहनी
तौर पर झेला मानसिक दर्द और दैहिक तौर पर झेला तशदद था, जिसकी टीस उसके रोज़मर्रा के जीवन से हूक बनकर निकलती रही। हम सभी ने उनके साथ हुई बेइंसाफी को महसूस तो किया लेकिन दूर-दूर से। समय गवाह है कि उसने बहत ही मुश्किल समय गुज़ारा, लेकिन हम उसके दर्द में शरीक होने तब आए, जब उसे हमारे सहारे और हमदर्दी की ज़रूरत नहीं रही। आज जब वह नहीं रहा, तो हम उसे श्रद्धांजलि भेंट करने आए हैं। दरअसल हम अब मगरमच्‍छ के आंसू बहाकर एक तरह से अपना फर्ज़ पूरा करने आए हैं। हम जिंदा लोगों के दुख दर्द में शामिल होने के बजाए मढि़या पूजने के आदी बन चुके हैं। जो ज्‍यादतियां साहित्‍य में हो रही हैं, उन्‍हें बंगारने का हम में साहस नहीं है। (यह शब्‍द पंजाबी साहित्‍यकारा सुरजीत कलसी के हैं, जिन्‍होंने लाल सिंह दिल की कविताओं को अंग्रेज़ी में अनुवाद किया था।) यहां प्रस्‍तुत है लाल सिंह दिल की कविताओं का हिन्‍दी अनुवाद
अंग्रेजी अनुवाद के लिए यहां क्लिक करें


वह साँवली औरत

जब कभी ख़ुशी में भरी कहती है--
"मैं बहुत हरामी हूँ !"
वह बहुत कुछ झोंक देती है
मेरी तरह
तारकोल के नीचे जलती आग में
तस्वीरें
क़िताबें
अपनी जुत्ती का पाँव
बन रही छत
और
ईंटें ईंटें ईंटें

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तुम्हारा युग

जब
बहुत सारे सूरज मर जायेंगे
तब
तुम्हारा युग आएगा
है न?
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काम के बाद

दिन भर की मेहनत के बाद
वे पल्लों से बाँध लेते हैं
अपने बच्चों की दिन भर की मेहनत की कीमत

दो रोटियों की वकालत करते हैं
ख़ुशामदी होते हैं
लौंडे की माँ का हाल बताते हैं
ठहाका लगाते हैं
और चुप्प हो जाते हैं
चले जाते हैं
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हमारे लिए

हमारे लिए
पेड़ों पर फल नहीं लगते
हमारे लिए
फूल नहीं खिलते
हमारे लिए
बहारें नहीं आतीं

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

जिंदुआ ते रस बिंदुआ...

पंजाबी में 'जुगनी' की तरह 'जिंदुआ' भी एक लोक काव्‍य रूप है। जुगनी तो हिन्‍दी फिल्‍मों में आ चुकी है। 'ओए लक्‍की लक्‍की ओए' में भी उसका एक रूप है। हालांकि इसके कई रूप मिलते हैं। जुगनी की ही तरह जिंदुआ के भी कई रूप मिलते हैं। इसमें प्रेमी और प्रेमिका का मीठा संवाद होता है, जिसमें प्रयसी अपने प्रेमी के साथ ही रहने की अभिलाषा व्‍यक्‍त करती है। इसके बारे में पूरा आलेख फिर कभी। अब हंस राज हंस की आवाज़ में यह जिंदुआ सुनिए...
मज़ा सुनकर ही आएगा, पढ़ नहीं... शब्‍दों से सुर-ताल का मेल जरूरी है।
.....................................................

जिंदुआ ते रस बिंदुआ (2)
दोवें सके भरा
जिंदुए संग जिंद मेरीए लै लैण मिला (2)
होगी ला ला, सारे घर विच्‍च, सारे दर विच्‍च, घर-घर विच्‍च।
............. हो वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ (2)
---
चल जिंदुआ वे चल चल्‍लीए बज़ारीं जित्‍थे ने विकदे रुमाल
हाड़ा वे जिंदुआ बुरे विछोड़े लै चल अपने नाल (2)
वे चल चंडीगढ़, चल दिल्‍ली शहर..(2).
............. हो वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ (2)
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चल जिंदुआ वे चल चल्‍लीए पहाड़ी, जित्‍थे ने विकदे अनार (2)
तूं तोड़ी मैं वेचण वाली, इक रुपइए चार
वे गोरे रंग दी मैं, लाली रंग दी मैं (2)
रब्‍ब तो रंगवाई आ ओ जिंदुआ
............. हो वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ (2)

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इक जिंदुआ वे तेरे नैण बिल्‍लौरी, विच्‍च सुरमे दी धारी
सुरमे वाले नैणा ने मेरे दिल ते बरछी मारी (2)
वे कुझ कह गया, जिंद लै गया (2)
वे जिंद मार मुकाई आ, ओ जिंदुआ
वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ हाड़ा वे जेहड़ी दिलां नूं लाई आ...
---

चल जिंदुआ वे चल मेले चल्‍लीए चल्‍लीए शौकीनी ला
कन्‍न विच्‍च मुंदरां सिर ते शमला गल विच्‍च कैंठा पा (2)
बड़ी फबदी ए, सोहणी लगदी ए (2)
वे जेहड़ी जैकट पाई आ ओ जिंदुआ,
वे दस दस कित्‍थों सवाई आ, ओ जिंदुआ
वे दस किन्‍ने दी आई आ, ओ जिंदुआ।

जिंदुआ ते रस बिंदुआ...

यहां सुनें जिंदुआ



बुधवार, 4 सितंबर 2013

प्रेम का हर क्षण अनंत आशीष है...

कीट्स... प्रेम और सौंदर्य का महान गायक, जो जीता रहा 'ब्राइट स्टार' के व्रेम की बेहोशी लिए। जो जूझता रहा ताउम्र क्षयरोग की विभीषिका से। पच्चीस साल की छोटी उम्र में दुनिया को प्रेम के महानतम गीत देकर हमेशा के लिए अलविदा कह जाने वाला कीट्स अफीम का बुरी तरह आदी था। सेंट एंड्रयूज यूनिवर्सिटी के प्रोफे्रसर निकोलस रो द्वारा लिखी गई कीट्स की जीवनी इस तथ्य को उजागर करने के कारण विवादों, आलाचनाओं औरचर्चाओं में घिरी है। ये राइटअप प्रो. निमकोलस रो की पुस्तक 'जॉन कीट्स-ए न्यू लाइफ' से प्रेरित...

प्रेम का हर क्षण अनंत आशीष है
कीट्स के छोटे से जीवन में दो सुंदर नाम जुड़े। जिनमें सबसे पहले जिक्र आता है- इजाबेल जोन्स का, जो उन्हें उस समय मिली, जब वे होस्टिंग्स के पास स्थित बो पीप नामक एक गांव में छुट्टियां बिताने के लिए गए थे। इजाबेल के विषय में कीट्स ने अपने भाई जॉर्ज को लिखा था कि 'वह समाज के उच्चवर्ग की तो नहीं कही जा सकती, फिर भी वह सुंदर और बुद्धिमान है और उसे समकालीन साहित्य की काफी जानकारी है...उन्होंने 'ओ स्वीट इजाबेल' तथा 'द ईव ऑफ सेंट मार्क' जैसी कविताएं इजाबेल के लिए लिखी थीं।

कीट्स की दूसरी प्रेमिका थी- फैनी ब्राउन, फैनी से उनकी मुलाकात सितंबर तथा नवंबर, 1818 के दौरान हुई, जो बाद में परस्पर प्रेम में परिवर्तत हो गई है। पैनी कीट्स से साहित्यिक पुस्तकें पढऩे के लिए ले जाया करती थी, जैसे-जैसे यह संबंध गहरा होता गया, वैसे वैसे कीट्स अनपी पहली प्रेमिका इजाबेल से दूर होते चले गए। अब उन दोनों ने एक साथ बैठकर काव्य संग्रह पढऩा शुरू कर दिया था। यह निकटता सगाई तक भी पहुंच गई, लेकिन फिर कीट्स के तपेदिक का शिकार हो जाने के कारण सगाई शादी में परिवर्तित नहीं हो सकी। कीट्स घोर अंधेरे तथा निराशा में डूब गए। उन्होंने फैनी को लिखे एक पत्र में अपने मन की भावनाओं को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया था- 'अब मेरे जीवन में चिंतन के लिए केवल दो ही बातें रह गई हैं- एक तो तुम्हारा प्रेम, जो सदैव अमर रहेगा और दूसरी मेरी मौत।'
13 अक्तूबर, 1819 को उन्होंने लिखा- 'मेरे प्रेम ने मुझे स्वार्थी बना दिया है। फैनी, तुम्हारे बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। मैं सब कुछ भूल सकता हूं, लेकिन तुमसे बार-बार मिलना कभी नहीं भूल सकता... मुझे अपने जीवन में तुम्हारे सिवाय और कुछ नज़र नहीं आता। तुमने मुझे पूरी तरह अपने अंदर समेट लिया है... मुझे इस क्षण यह अनुभूति हो रही है मानो मैं धीरे-धीरे हवा में विलीन होता जा रहा हूं- अगर मेरी इस आशा ने दम तोड़ दिया कि शीघ्र ही मैं तुमसे मिलूंगा तो शायद मेरा जिंदा रहना भी नामुमकिन हो जाएगा। ... मुझे यह सोच कर हैरानी होती है कि कोई मनुष्य अपने धर्म के लिए शहीद हो सकता है... मेरा धर्म तो केवल प्यार है, जिसके लिए मैं अपनी जान भी न्योछावर कर सकता हूं... मैं तुम्हारे लिए मर भी सकता हूं।'

इस धरती का गीत अमर है

कीट्स एक जन्मजात कवि थे। अपने स्कूल के दिनों से ही वे तुकबंदी करने लगे थे और केवल 15 साल की उम्र में उन्होंने लैटिन के महाकवि वर्गिल के महाकाव्य वर्गिल के महाकाव्य का अनुवाद कर डाला था। उन्होंने 1814 में सुप्रसिद्ध सॉनेट 'इमिटेशन ऑफ स्पेंसर' लिखी, जबकि उनकी 'ओड टु ऑटम' 1819 में लिखी गई थी। उनके अधिकतर गीत इस पांच साल की अवधि के दौरान ही लिखे गए थे। एक बार मित्र हण्ट की चुनौती स्वीकार करते हुए कीट्स ने 15 मिनट से कम समय में ही एक सॉनेट लिख डाली थी।
रो का यह विवादास्पद कथन कि कीट्स अपनी कविताएं लिखने के लिए अफीम का सहारा लेते थे, केवल इस एक तथ्य पर आधारित है कि अक्सर अफीम से बने एक मिश्रण लौडैनम का सहारा
लेते थे। उस समय यह मिश्रण मेडिकल साइंस में एक कारगर 'पेन किलरÓ के रूप में जाना जाता था। रो का कहना है कि 'ओड टु मीलेंचली' तथा 'ओड टु मेलोडी' अफीम की तुनक में लिखी गई कविताएं है। यह कीट्स की काव्य-क्षमता पर शक करने जैसा है।
कीट्स डॉक्टरों की सलाह पर पहले इटली और फिर रोम चले गए। इटली जाने के बाद उन्होंने फैनी को कोई पत्र नहीं लिखा। शायद उन्होंने यह दर्दनाक हकीकत स्वीकार ली थी कि अब वे फैनी से कभी नहीं मिल पाएंगे। वे अपने आपको उसके दिल से बाहर निकालना चाहते थे ताकि फैनी जिंदा रह सके।
(जितेंद्र कुमार मित्तल के सौजन्य से)

Prof Nicholas Roe


मंगलवार, 23 जुलाई 2013

कवि जहां से देखता है, दरअसल, वह वहीं रहता है

आपके टिकने की जगह या 'पोजीशन' का सवाल, लेखन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। फ़र्ज़ कीजिए, हम पांच कवियों को एक गुलाब या एक लाश देते हैं और उस पर लिखने के लिए कहते हैं। जिस 'पोजीशन' से वे उस पर लिखेंगे, वही 'पोजीशन' उन्हें एक-दूसरे से अलग करेगी। कुछ लोग इसे 'एक लेखक द्वारा अपनी आवाज़ पा लेना' कहते हैं। अपनी पोजीशन पाने में बहुत समय लगता है और मेरा मानना है कि लेखन में यही बुनियादी चुनौती भी है। एक बार आपने अपनी पोजीशन पा ली, लेखन अपने आप खुलने लगता है, हालांकि उस समय नई चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। मेरी कविताओं के मामले में बेचैनी यही थी कि इस दहलीज़ वाली पोजीशन से अरबी भाषा में कविता कैसे लिखी जाए।
आज मैं इस पूरी यात्रा का वर्णन कर पा रही हूं, लेकिन उस समय तो मैं उस बेचैनी को साधारण तौर पर निराशा ही मान लेती थी।
-ईमान मर्सल

यहां प्रस्‍तु‍त हैं ईमान की दो कविताएं

महीन रेखा

अधेड़ उम्र की एक औरत पागलों की तरह अपने प्रेमी की क़मीज़ें फाड़ती है
वह उन पर अपने आंसुओं को ख़ारिज करती है कैंचियों के ज़रिए, फिर नाख़ूनों से
फिर नाख़ूनों और दांतों के ज़रिए
मेरी कुंआरी बुआ ऐसे दृश्य पर रोया करती थी पिछली सदी में, जबकि मैं
ऊबकर उसके ख़त्म हो जाने का इंतज़ार करती थी,
मुझे रुला देते हैं अब ऐसे दृश्य.
कैंचियों, नाख़ूनों और दांतों से एक स्त्री
एक अनुपस्थित देह का पीछा करती है
उसे चबाकर, उसे निगलकर.
कुछ भी नहीं बदला है. नायिकाएं हमेशा दुख पाती हैं परदे पर,
लेकिन उत्तरी अमेरिका में आर्द्रता का स्तर हमेशा कम रहता है
सो, आंसू बहुत जल्दी सूख जाते हैं.
* * *

तुमने हवास खो दिए

मैं अपने बाल पीछे बांध लेती हूं
उस लड़की जैसा दिखने की कोशिश करती हूं
जिसे एक समय तुम बहुत लाड़ करते थे.
बरसों, घर लौटने से पहले
मैं बीयर से धोती थी अपना मुंह.
तुम्हारी मौजूदगी में मैंने कभी ख़ुदा का जि़क्र तक न किया.
ऐसा कुछ नहीं तो तुम्हारी माफ़ी के क़ाबिल हो.
तुम बहुत दयालु हो, लेकिन निश्चित ही उस समय तुमने अपने हवास खो दिए होंगे
जब तुमने मुझे यह यक़ीन दिला दिया था
कि ये दुनिया एक गर्ल्‍स स्कूल की तरह है
और टीचर की लाडली बनी रहने के लिए
मुझे अपनी इच्छाओं को एक किनारे रखना होगा.
अनुवाद: गीत चतुर्वेदी


ईमान मर्सल
30 नवंबर 1966 को जन्मी ईमान मर्सल अरबी की सर्वश्रेष्ठ युवा कवियों में से एक मानी जाती हैं। अरबी में उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और चुनी हुई कविताओं का एक संग्रह, ख़ालेद मत्तावा के अनुवाद में, 'दीज़ आर नॉट ऑरेंजेस, माय लव' शीर्षक से 2008 में शीप मेडो प्रेस से अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुआ। अरबी साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद ईमान ने बरसों काहिरा में साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिकाओं का संपादन किया। 1998 में वह अमेरिका चली गईं और फिर कनाडा। अंग्रेज़ी के अलावा फ्रेंच, जर्मन, इतालवी, हिब्रू, स्पैनिश और डच में उनकी कविताओं का अनुवाद हो चुका है। उन्होंने दुनिया-भर में साहित्यिक समारोहों में शिरकत की है और कविता-पाठ किया है। वह एडमॉन्टन, कनाडा में रहती हैं और अलबर्टा यूनिवर्सिटी में अरबी साहित्य पढ़ाती हैं।


रविवार, 26 मई 2013

प्रेम में कृष्‍ण, कृष्‍ण में प्रेम…


पेंटिंग : दीपाली देशपांडे

कृष्ण उस प्यार की समग्र परिभाषा है जिसमें मोह भी शामिल है, नेह भी शामिल है, स्नेह भी शामिल है और देह भी शामिल है। .कृष्ण का अर्थ है कर्षण यानी खींचना, यानी आकर्षण और मोह। सम्मोहन का मोहन भी तो कृष्ण है। वह प्रवृति से प्यार करता है। वह प्राकृत से प्यार करता है। गाय से, पहाड़ से,  मोर से, नदियों के छोर से प्यार करता है। वह भौतिक चीज़ों से प्यार नहीं करता।  वह जननी (देवकी ) को छो ड़ता है, ज़मीन छोड़ता है। ज़रूरत छोड़ता है, जागीर छोड़ता है , जिंदगी छोड़ता है, पर भावना के पटल पर अटलता देखें, वह मां यशोदा को नहीं छोड़ता। देवकी को विपत्ति में नहीं छोड़ता, सुदामा को गरीबी में नहीं छोड़ता, युद्ध में अर्जुन को नहीं छोड़ता। वह शर्तों के परे सत्य के साथ खड़ा हो जाता है टूटे रथ का पहिया उठाए आख़िरी और पहले हथियार की तरह।

उसके प्यार में मोह है, स्नेह है, संकल्प है,  साधना है,  आराधना है,  उपासना है पर वासना नहीं है। वह अपनी प्रेमिका को आराध्य मानता है इसी लिए "राध्य" (अपभ्रंश में हम राधा कहते हैं ) कहकर पुकारता है। उसके प्यार में सत्य है सत्यभामा का, उसके प्यार में संगीत है, उसके प्यार में प्रीति है। उसके प्यार में देह दहलीज पर टिकी हुई वासना नहीं है। 


पेंटिंग : दीपाली देशपांडे
( Dipali Deshpande is a self-taught Indian artist. She studied Engineering but painting is always been her passion. She worked in corporate sector for few years but her real joy was hiding in colors.)

शनिवार, 25 मई 2013

प्रेम और प्रेम

पेंटिंग - हेस्साम अब्रिशामी
(Hessam Abrishami is an Iranian artist who lives in California, United States.
Hessam’s works are greatly influenced by his dramatic life experiences
and the warm acceptance he has received from the world at large.)

प्रेम किसी एक व्यक्ति से हमारे संबंधों का नाम नहीं है। यह दृष्टिकोण है, एक चारित्रिक रुझान है। जो किसी व्यक्ति के साथ-साथ पूरी दुनिया से हमारे संबंधों को अभिव्यक्त करता है। वह केवल एक लक्ष्य और उसके साथ के संबंधों का नाम नहीं है। अगर एक व्यक्ति केवल दूसरे एक व्यक्ति से प्रेम करता है और अन्य सभी व्यक्तियों में उसकी रुचि नहीं है, तो उसका प्रेम, प्रेम न होकर उसके अहं का विस्तार मात्र है। फिर भी ज्यादातर लोग यही समझते हैं कि प्रेम एक 'लक्ष्य'  है न कि एक 'क्षमता'।

वे समझते हैं कि भूल भी करते हैं कि यदि वे केवल अपने 'प्रेमी' या 'प्रेमिका' से ही प्रेम करते हैं, तो यह उनके प्रेम की गहराई का प्रतीक है। इसका मतलब है कि वे प्रेम को एक गतिविधि के रूप में, 'आत्मा की एक शक्ति' के रूप में नहीं देखते।

उन्हें लगता है कि एक 'प्रेमी' या 'प्रेमिका' होने का अर्थ है 'प्रेम' को पा लेना। यह बिलकुल वैसी ही बात है, जैसे कोई व्यक्ति चित्रकारी करना चाहता है और समझे कि उसे केवल एक प्रेरक विषय की जरूरत है, जिसके मिल जाने पर वह स्वत: ही बढ़िया चित्रकारी कर लेगा। अगर मैं किसी एक व्यक्ति से सचमुच प्रेम करता हूँ तो मैं सभी व्यक्तियों से प्रेम करता हूँ। किसी से 'मैं तुम्हें प्यार करने का सच्चा अर्थ' यह है कि 'मैं उसके माध्यम से पूरी दुनिया और पूरी जिंदगी से प्यार करता हूं।  |एरिक फ्रॉम|

एरकि फॉम
Erich Seligmann Fromm (March 23, 1900 – March 18, 1980) was a German social psychologistpsychoanalystsociologisthumanistic philosopher, and democratic socialist. He was associated with what became known as the Frankfurt School of critical theory.










 

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

इंट्रोवर्ट हैं तो खुद को बिल्कुल न बदलें!


सुजेन केन
प्रोफाइल : लेखक बनने से पहले 7 साल जेपी मॅार्गन और जनरल इलेक्ट्रिक जैसी कंपनियों की कंसल्टेंट थीं।
क्यों पढ़ें: इसे अब तक 35 लाख से ज्यादा लोग विभिन्न वेबसाइट्स पर सुन चुके हैं।



मैं जब 9 साल की थी तब पहली बार समर कैंप में गई। मां ने मेरे लिए जो सूटकेस तैयार किया उसमें किताबें भरी थीं। आप लोगों को शायद ये थोड़ा अजीब लगे लेकिन मेरे परिवार में किताबें पढऩा सबसे जरूरी गतिविधि रही है। मैने दिमाग में छवि बनाई थी कि कैंप में मुझे किताबें पढ़ती कुछ लड़कियां नजर आएंगी। लेकिन जब मैं वहां पहुंची वो किसी पार्टी की तरह लगा। मैं इंतजार कर रही थी कब मुझे वापस कमरे में जाकर किताब पढऩे का मौका मिले। पर जब भी मैं किताब पढऩे जाती तो मुझसे पूछा जाता मैं क्यों उदास हूं। पूरे समर कैंप में मैंने किताबों को देखा तक नहीं। मैंने कैंप में 50 बातें महसूस की जिससे मुझे लगा कि मुझे एक्स्ट्रोवर्ट होना चाहिए। कहीं अंतर्मन में यह बात हमेशा थी कि इंट्रोवट्र्स जैसे हैं उसी रूप में बेहतरीन हैं। पर शायद यह बात मानने में मुझे सालों लग गए इसलिए मै वॉल स्ट्रीट लॉयर बन गई। जबकि मैं हमेशा से लेखक ही बनना चाहती थी। मैनें वो सब किया जो औरों को तो सही लगा,  मुझे नहीं। दुनिया के अधिकांश इंट्रोवट्र्स ऐसा ही करते हैं।

इंट्रोवट्र्स शर्मीले नहीं होते। उनकी अभिव्यक्ति का तरीका अलग होता है। मुझे लगता है हमारे स्कूल और दफ़तर एक्स्ट्रोवट्र्स को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। गणित जैसे विषय, जहां हमें अकेले लडऩा होता है वहां भी ग्रुप असाइनमेंट दिए जाते हैं। मैं आपको बता दूं कि एलिनोर रूजवेल्ट, महात्मा गांधी ने स्वयं को शांत और शर्मीला बताया था। जिनके शरीर का हर अंग स्पॉटलाइट से दूर रहना चाहता था। लेकिन उन्होंने इतिहास रचा। स्टीव वोजनिएक ने पहला एपल कंप्यूटर हैवलेट पैकर्ड में अकेले बैठकर बनाया था।

इसका अर्थ यह नहीं कि हम सारे डार्विन की तरह जंगलों में घूमें। बुद्ध की तरह ख़ुद ही अपनी चीजें खोजिए। ये देखें कि आपके सूटकेस में किताबें हो या कुछ और उन्हें बदलिए मत। इंट्रोवट्र्स आप जैसे हैं उसी मैं आपकी ताकत है। दुनिया को आपकी जरूरत आपके नैसर्गिक रूप में है।  (स्रोत: वर्डप्रेस)

बुधवार, 5 सितंबर 2012

नि:शब्‍द

शिक्षक अपनी कक्षा में पढ़ा रहे थेउसी समय बाहर से ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़े आने लगीं। उत्सुक शिक्षक और विद्यार्थी कक्षा छोड़ कर बाहर आए, देखा कि विद्यालय के ही दो कर्मचारी तू-तू, मैं-मैं करते हुए ऊँची आवाज़ में झगड़ रहे हैं और उनके आसपास भीड़ जमा थी। किसी तरह बीच बचाव कर के विवाद समाप्त किया गया।
Painting Vickie Wade (UK)

शिक्षक और उनके विद्यार्थी वापस अपनी कक्षा में पहुँचे, पर झगड़े का दृश्य देख कर उन सबका मन ख़राब हो चूका था। एक विद्यार्थी ने पूछ ही लिया, "सर, वो दोनों इतनी ज़ोर-ज़ोर से क्यों चिल्ला रहे थे ? इतनी पास से तो धीमी आवाज़ भी सुनी जा सकती थी?

इस पर शिक्षक ने जवाब दिया, "जब किसी को किसी पर ज़ोर से क्रोध आता है, तो उन दोनों के दिलों के बीच की दूरियां बहुत बढ़ जाती हैं। जब दूरियां बढ़ जाती हैं तो ना कुछ दिखाई पड़ता है, ना सुनाई पड़ता है। 

यही कारण है कि लड़ने वाले चिल्ला-चिल्लाकर बात करते हैं। तुम लोगों ने देखा होगा कि जब दो व्यक्तियों में संबंध अच्छे रहते हैं तो वे धीरे-धीरे बात करते हैं और एक-दूसरे की बात इसलिए सुन पाते हैं क्योंकि उनके दिलों के बीच की दूरी बहुत कम होती है। कई बार तो कुछ कहने की भी ज़रूरत नहीं होतीआंखों-आंखों में ही बात हो जाती है। जब दिलों में दूरियां नहीं होंगी तो ना ईर्ष्या होगी और ना ही क्रोध..... फिर क्यों हम किसी पर चिल्लाएंगे...।


शनिवार, 7 जुलाई 2012

अमर प्रेम

महात्मा गांधी और सरला देवी




यह कहानी तो कुछ-कुछ यश चोपड़ा की फिल्म 'कभी कभी' जैसी है। सरला देवी रविंद्र नाथ ठाकुर की भतीजी थीं। उनके पति चौधरी रामभज दत्त आर्य समाज और कांग्रेस में अच्छी पैठ रखते थे। वह जब जेल में थे तो गांधी जी उनकी पत्नी के मेहमान थे, उनके घर में। चार बच्चों के पिता 50 वर्षीय गांधी खूबसूरत सरला देवी पर ऐसे मोहित हुए कि उनका अपना परिवार और राजनीतिक जीवन तक खतरे में आ गया। गांधी जी के पोते के मुताबिक दोनों ओर से मोहब्बत की शिद्दत बराबर थी। गांधी जी ने तो कहा था कि सरला के साथ उनका 'अध्यात्मिक विवाह' हो चुका है। लेकिन दोनों ने ही अपनी आत्मकथा में इस प्रसंग का जिक्र नहीं किया है। आखिर इस प्रेम की परिणति 'कभी कभी' की तरह हुई। सरला के बेटे दीपक चौधरी ने गांधी जी की बेटी से विवाह कर लिया।

जवाहर लाल नेहरू और लेडीमाउंटबेटन




लोग कहते हैं इस लव स्टोरी ने भारत के इतिहास को प्रभावित किया है। लेडी माउंटबेटन की बेटी पामेला ने अपनी एक किताब में लिखा है कि दोनों के बीच रुहानी संबंध था। साथ ही वह यह भी कहती हैं कि कई बार मेरी मौजूदगी उन दोनों के लिए असहजता की स्थिति पैदा कर देती थी। दोनों घंटों तक कमरे में अकेले रहते थे। लॉर्ड माउंटबेटन भी दोनों को अकेला छोड़ देते थे। लेकिन यह साबित कोई नहीं कर पाया कि दोनों में शारीरिक संबंध थे। वैसे कुछ चीजें साबित करने के लिए नहीं होती।
सुभाष चंद्र बोस और एमिली




हाल ही में श्याम बेनेगल ने नेता जी पर फिल्म बनाई तो मुद्दा खड़ा हो गया उनकी शादी का। उससे पहले बहुत कम लोग जानते थे कि नेता जी की शादी हो गई थी। अजीब प्रेम कहानी थी यह भी। एमिली नेता जी की सेक्रेटेरियल असिस्टेंट के रूप में काम करती थीं। उन्हें जर्मन सरकार ने नेता जी पर नजर रखने का हुक्म दिया। इससे नेता जी को चाहने वाली एमिली के सामने नैतिक सवाल खड़ा हो गया। और इसका हल भी उन्होंने खोज लिया, नेता जी से शादी। जर्मन कानून के मुताबिक पत्नी की गवाही मायने नहीं रखती। नेता जी को उनसे एक बेटी भी मिली। इस तरह एक और प्रेम कहानी अमर हो गई।


अडॉल्फ हिटलर और इवा ब्राउन




इतिहास के सबसे बड़े और क्रूर तानाशाह की प्रेमिका होना कोई आसान बात नही। इवा के लिए भी यह आसान नहीं था। एक अमीर बाप की बेटी इवा ब्राउन उस शख्स के प्यार में उस कदर पागल थीं कि उसने कुछ नहीं चाहा। हिटलर ने कभी इवा को सम्मान नहीं दिया, हक नहीं दिया। वह उनके लिए सिर्फ एक इस्तेमाल की चीज बनी रही। लेकिन इवा ने कभी हिटलर को नहीं छोड़ा। साये की तरह वह दीवानी हिटलर का साथ देती रही। और कहते हैं कि जब रूसी फौजें बर्लिन में घुसीं, तो इवा और हिटलर ने एक दूसरे के सामने आत्महत्या कर ली। उफ्फ..क्या लव स्टोरी है।

राजीव और सोनिया गांधी



मोहब्बत कैसे जिंदगी बदल देती है, इसकी कहानी है राजीव और सोनिया की लव स्टोरी। राजीव लंदन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनटी कॉलेज में पढ़ने गए थे। उसी यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ लैग्वेजेज में इटली की एक लड़की पढ़ रही थी। गरीब घर की वह लड़की पढ़ने के लिए पैसे जुटाने के वास्ते एक रेस्ट्रॉन्ट में काम करती थी। राजीव को वह लड़की बहुत पसंद थी। बस, धीरे-धीरे जवां दिल एक-दूजे के हो गए। कैथलिक सोनिया के मां-बाप ने इस रिश्ते का जमकर विरोध किया, तो सोनिया अपनी दुनिया छोड़कर एक नई दुनिया में चली आई अपने महबूब के साथ। फिर उसने देखा राजनीति के नाम होने वाली हत्याओं का खेल। बताते हैं कि सोनिया कभी राजीव को अकेले कहीं नहीं जाने देती थीं। एक बार वह अकेले श्रीलंका चले गए तो उनपर हमला भी हो गया था। एक बार फिर राजीव अकेले चले गए एक रैली में। और फिर लौटकर नहीं आए। सोनिया आज भी वे जिम्मेदारियां निभा रही हैं, जो उनकी मोहब्बत के नाम पर उन्हें मिली हैं।


प्रिंस एडवर्ड और वैलिसा सिंपसन





इश्क के लिए तख्त-ओ-ताज न्योछावर कर देने की मिसाल शायद यहीं से पैदा हुई होगी। प्रिंस यूं तो बांके जवान थे लेकिन शादीशुदा महिलाओं में उनकी खास दिलचस्पी थी। इस दिलचस्पी ने कई कहानियां बनाई। और इसी दिलचस्पी ने उन्हें एक दिन अमेरिका की एक गरीब सी महिला वैलिसा के सामने ला खड़ा किया। दोनों मिले। फिर मिले। बार-बार मिले। और पता नहीं कब प्यार हो गया। प्रिंस एडवर्ड तब ताज संभालने की भी तैयारी कर रहे थे। दोनों के किस्से चर्चित हो गए। सिंपसन ने अपने दूसरे पति को भी तलाक दे दिया। लेकिन यह साफ हो गया कि ब्रिटेन वैलिसा को रानी के रूप में स्वीकार नहीं करेगा। एडवर्ड को मोहब्बत और ताज में से एक चुनना था। उन्होंने मोहब्बत चुनी। कितने ही लोगों को उससे पहले और उसके बाद ताज मिला, किसे याद है। हां, एडवर्ड बहुत से लोगों को याद हैं।


प्रिंस चार्ल्स और कैमिला पार्कर



1970 में एक पोलो मैच में कैमिला और प्रिंस चार्ल्स मिले। कुछ दिन दिल धड़कते रहे और फिर 1972 में जुदा हो गए। प्रिंस ने नेवी जॉइन कर ली और कैमिला ने शादी कर ली। 1981 में प्रिंस की भी शादी हो गई, लेकिन पार्कर से उनका संपर्क बना रहा। 1994 में प्रिंस ने कहा कि अब भी उनके कैमिला से रिश्ते हैं। इससे दोनों शादियां बर्बाद हो गईं। सात महीने बाद ही कैमिला का तलाक हो गया। अगस्त 1996 में प्रिंस और डायना भी अलग हो गए। और 1997 में डायना चल बसीं। आखिरकार 2005 में दो प्रेमी मिल ही गए। 25 साल बाद मोहब्बत अपने अंजाम पर थी।

नैपोलियन और जोसेफिन



नैपोलियन के एक अफसर बरास की पत्नी थी रोज। नैपोलियन तब पत्नी की खोज में था और बरास रोज से छुटकारा चाहता था। उसने रोज को नेपोलियन की तारीफ करने और उसके साथ रहने को कहा। रोज की थोड़ी सी लुभावनी बातों से नैपोलियन पिघल गया। उसे प्यार हो गया। बरास ने रोज को कहा कि मैं तुम्हें छोड़ दूंगा तो तुम सड़क पर आ जाओगी, इसलिए नैपोलियन से शादी कर लो। मजबूरी में रोज ने नैपोलियन से शादी कर ली। नैपोलियन ने ही उसे जोसेफिन नाम दिया। लेकिन जोसेफिन तो नैपोलियन को नहीं चाहती थी। जब नैपोलियन लड़ाई के लिए इटली गया तो वह फ्रांस में ही रह गई। पीछे से उसने अपनी अय्याशियां शुरी कर दी। नैपोलियन ने उसे कई बार अपने पास बुलाया, लेकिन वह रोज नए बहाने बना देती। उसने यहां तक कह दिया कि मैं प्रेग्नेंट हूं इसलिए नहीं आ सकती। जब बरास को लगा कि नैपोलियन इसके चक्कर में लड़ाई छोड़कर ना आ जाए तो उसने जबर्दस्ती जोसेफिन को इटली भेजा। जोसेफिन ने नैपोलियन से कहा कि रास्ते में उसका गर्भ गिर गया। नैपोलियन फूट-फूट कर रोया। कुछ दिन बाद नई लड़ाई के लिए वह फिर फ्रांस से बाहर चला गया और जोसेफिन की अय्याशियां शुरू हो गई। और जो होना था, एक दिन नैपोलियन को पता चल गया। वह फ्रांस लौटा। उसने कहा कि तुमने मेरा दिल तोड़ा है। अब मैं किसी से कभी प्यार नहीं कर पाऊंगा। जोसेफिन शर्म से पानी-पानी हो गई। उसके बाद जिंदगी पलट गई। ताउम्र जोसेफिन नैपोलियन के प्यार में मरती रही और नैपोलियन अय्याश हो गया। आखिर तक उसने जोसेफिन को माफ नहीं किया।


एंटनी और
क्लियोपेट्रा




क्लियोपेट्रा रोम के सम्राट जूलियस सीजर की रखैल थी। बताते हैं कि इतिहास की सबसे मशहूर औरतों में से एक क्लियो मैथ्स की विद्वान थी और 9 भाषाएं जानती थी। उसकी इंटेलिजेंस और नॉलेज का सीजर भी कायल था। वही क्लियोपेट्रा सीजर एक दोस्त एंटनी को दिल दे बैठी। दोनों एक-दूसरे के दीवाने हो गए थे। लेकिन राजनीति को यह मोहब्बत मंजूर नहीं थी। मिस्र की बढ़ती ताकत से परेशान रोम के लोग मिस्र की एक औरत को एंटनी की पत्नी बनते नहीं देखना चाहते थे। इसलिए साजिश रची गई। एंटनी को लड़ाई के दौरान झूठी खबर दी गई कि क्लियोपेट्रा नहीं रही। खबर सुनते ही एंटनी सदमे में आ गया और अपनी तलवार पर गिरकर मर गया। यह खबर जब क्लियोपेट्रा को मिली, तो उसने खुद को एक जहरीले सांप के आगे डाल दिया। सांप के जहर से फौरन उसकी मौत हो गई। मोहब्बत करने वाले शहीद हो गए, मोहब्बत आज भी जिंदा है।



शाहजहां और मुमताज



सन 1612 में 15 साल के मुगल शहजादे ने एक और शादी की। लड़की थी अर्जुमंद बानो। यूं तो उसके बाद भी शहजादे ने कई शादियां कीं, लेकिन बानो में कुछ ऐसा था कि शहजादा उसका दीवाना था। उसने बानो को नाम दिया था। मुमताज। 1629 में मुमताज की बच्चे को जन्म देते हुए मौत हो गई। उससे पहले वह 14 बच्चों को जन्म दे चुकी थीं। मुमताज की मौत ने शाहजहां को हिलाकर रख दिया। उसने खुद को कमरे में बंद कर लिया। कई दिन बाद जब बादशाह बाहर निकला, तो वह बूढ़ा हो चुका था। उसके बाद उसके सिर पर बस मुमताज को अमर कर देने की धुन सवार हो गई। उसने दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारत बनाने का हुक्म जारी कर दिया। 20 हजार लोग और एक हजार हाथी 20 साल तक लगातार काम करते रहे और तब जाकर वह इमारत खड़ी हुई, जिसे लोग ताजमहल कहते हैं। फिर शाहजहां भी चल बसा। मोहब्बत अमर हो गई